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उत्साह


 हिन्दी साहित्य के निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक निबंध उत्साह अभी हाल ही में मैंने पढ़ा जो कि चितामणि के भाग 1 का एक अंश है 

जिसका नाम था 'उत्साह ' जिस पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं" कि उत्साह के साथ व्यक्ति सभी कठिन काम को कर लेता जबकि इसके विपरीत अगर कोई व्यक्ति बिना उत्साह के जीवन के भयंकर कष्ट झेलता है और तब भी अपने काम को करता जाता है तब को उत्साह नहीं अपितु साहस कहा जाता है"

जिस पर वो आगे कहते हैं कि जब व्यक्ति किसी साध्य को जिसका अर्थ है' (सम्भव कार्य का पूरा कर लेना ')कर लेता है तो वो आगे भी उसी कार्य को उत्साह के साथ करते जाता है

जबकि इसके विपरीत अगर कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करने की सोचता है जिसमें उसे मालूम होता है कि वो उसे पूरा नहीं कर पाएगा वो असाध्य है जिसका अर्थ है( कि वो कार्य असम्भव है )तो भी अगर वो आगे कार्य जारी रखता है तो उसे उत्साह के साथ नहीं अपितु साहस के साथ करता है

आगे शुक्ल निबंध में बताते हैं कि अगर व्यक्ति किसी कार्य को लगातार करता जाता है किसी विशेष लक्ष्य को साधने के लिए तो ऐसे में भले उस व्यक्ति के सभी कार्य पूरे न हो किन्तु वो जीवन में प्रयत्न करना सीख जाता है और लगातार उसे करता जाता है

भले उसे इस कार्य में सफलता न मिले किन्तु उसकी जीवन के जीने की प्रक्रिया वो एक अलग ढंग से जीता है जिसके चलते वो एक अलग ढांचे से गढ़ दिया जाता है 

उसे अपने जीवन में कोई पछतावा नहीं रह जाता है कि उसने कोई कार्य निष्ठा लगन के साथ नहीं किया 

आज के समय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध में चिंतमणि के भाग 1 के निबंध में भले वो भय हो, , उत्साह दोनों ही हमें इस विषय पर गंभीर विचार करने को छोड़ देते हैं कि जिसे हम उत्साह मानते हैं अक्सर वो साहस के रूप में होता और जिसे साहस मानते हैं वो उत्साह के रूप में होता है 

शुक्ल ज्यादातर विचार परक, तथ्यात्मक निबंध लिखते हैं इनके निबंध के विषय अशोचनीय होते हैं साहित्य में ये अपना विशेष स्थान रखते हैं .

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