जब -जब लगे जिंदगी हो गयी है आसान
तब -तब हो जाते हैं
कड़े इम्तिहान
आती है चारों तरफ से परेशानी
समझ नहीं आता जाए
किस और इंसान?
जहाँ एक तरफ होता कुआँ
तो दूसरी तरफ होती है खाई
थोड़े आसूं थोड़े गम पीकर अब है
चलने की बारी है आयी,
"क्योंकि पत्थर उसी पर है पड़ते हैं
जिसमें फल की उम्मीद होती है"
जिसे सहने की क्षमता है भाई,
सिर का दर्द हो, या शरीर का दर्द
नहीं सहा जाता अपनों का दर्द
है इस जिंदगी की यहीं सच्चाई
सब को पड़ते है मूसर कभी न कभी
क ई चोटों को खाकर
बनता है ये आदमी
जिंदगी है दुख और
सुख की लड़ाई
जिसका हर रस
इंसान है पीता
महज फर्क इसे होता
इंसान सुख की घड़ी
आनंद के साथ जीता
दुख की घड़ी घुट घुट कर जीता ,
ज़ो नहीं झुकते मुसीबतों के आगे
उनके सामने हर कोई है झुकता
ज़ो नहीं मानते हार
व़ो अजेय होता ,
"कुम्हार भी कितनी
चोट देता घड़े को
पर क्या घड़ा
आंसू नहीं है पीता?
वो तपता आग में
कुटता पांव में
जब जाकर वो एक
घड़े का आकार है लेता"
हम तो खुदा के बंदे हैं
फिर क्यों आज एक आम
इंसान डर जाए थोड़ी सी विपत्ति से
क्यों झुक जाए ?
थोड़ी कठिनाई की आंधी से
तुम जान लो हर कठिनाई
नहीं आती तुम्हें विफल करने ,
Comments