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इच्छा जाहिर न कर पाने का दर्द


आज एक सीरियल देखते समय मन में एक प्रश्न कौधा की सच में क्या आज भी  ऐसा ही होता है ? 

एक अदालत में जब पेशी होती है तो अदालत में सबूत के तौर पर पेश होने वाले व्यक्ति को  अदालत के सामने ये विद्या की कसम खानी  होती है 'कि वो जो कहेगा सच कहेगा, सच के सिवाय कुछ नहीं कहेगा 

किन्तु  इसके विपरीत 

अक्सर जीवन में  किसी  बेगुनाह व्यक्ति को सजा उसके सच कहने के कारण दे दी जाती है

वहीं दूसरी ओर किसी व्यक्ति को

सजा का पात्र केवल इसलिए बनना पड़ता है कि उसने 

किसी मुद्दे पर तर्क के साथ उसे दूसरे ढंग से सुलझाने की बात कही  उसने अपनी इच्छा जाहिर जो की सामने वाले को रास न आयी 

कितना अजीब है न अक्सर व्यक्ति अपनी इच्छा जाहिर करने के कारण दंड का पात्र बन जाता है 

और हम सब के सामने एक सवाल छोड़ जाता है कि क्या अपनी इच्छा जाहिर करना गुनाह है?

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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

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