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समझ और समझदारी में फर्क

 

हम अक्सर दो चीजों में ही उलझे रहते हैं जिसका फर्क करते समय अक्सर हम ये भूल जाते हैं कि सच और झूठ की दीवार

किसे कहते हैं हजार बार झूठ को दोहराने पर भी वो सत्य हो जाता है और झूठ सच में तब्दील हो जाता है हमें मालूम ही नहीं चल पाता कि ये सब

ठीक इस तरह ही समझ ओर समझदारी की गफलत में हम फंस कर रह जाते हैं और जब इसके भवर से निकलते हैं तब तक देर हो चुकी होती थी समझ और समझदारी के फर्क को समझने की.

जरा गौर फरमाएगा इस बात पर कि आज दस मूर्ख के बीच एक समझदार इंसान है जो खुद  इनमें शामिल हो चुका है क्योंकि उसकी तुलना में मूर्ख आबादी ज्यादा है

आज के समय में जब तमाम तरह के आकर्षण हमारे आस पास मौजूद है तब ऐसे समय में हम सब को अपने उन काम को प्राथमिकता देने की जरूरत है जो सच में प्राथमिकता रखती है किन्तु हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं

आज के समय में एक समझदार व्यक्तित्व वो ही है जो खुद के बारे में अच्छा बुरा जानता है और अच्छे से दोस्ती बुरे से बेवफा

 बनाकर रहता है वो ही खुशकिस्मत है जो समझदार से से ज्यादा समझदारी पर विश्वास करता है.






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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

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