महाभारत के वो पात्र जो हमें जीवन जीना सीखाते हैं


महाभारत की महत्ता वर्तमान समय में 

 भारतीय हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा  दार्शनिक ग्रंथ महाभारत है जिसे कालजयी भी कहा जाता है 

महाभारत में गीता का ये श्लोक ' जीवन है संघर्ष मायी' हम सब को एक पल ठहरने को कहता है और  हमें ये सोचने को मजबूर करता है कि सच में क्या जीवन संघर्ष मायी है ? 

 आज जब हम महाभारत को युवा पीढ़ी के नजरिये से देखते हैं तो मालूम चलता है कि आज 

का युवा जहाँ एक तरफ कर्म पर कम और फल की चिंता में ज्यादा लगा हुआ है वहीं दूसरी तरफ वो 

 युवा अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य को साधने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा हैं  वहीं इसके विपरीत  कलयुग की द्रोपदी की इज्जत दुर्योधन के द्वारा लुटी जा रही है जिसे रोकने के लिए आज कृष्ण कहीं अदृश्य हो गए है आज हर घर में युधिष्ठिर की कमी ह़ोती जा रही है साथ ही गीता का ज्ञान देने वाले श्रीकृष्ण आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं जो कर्मयोगी युवा को सही राह दे सके जिसके चलते आज अज्ञानता के बादल चारों तरफ दिखाई दे रहे है 

आज इस लेख में हम उन पात्रों के बारे में विचार करेंगे जिनसे हम कुछ सीख सकते हैं

जिनमें सर्वप्रथम कर्ण आते हैं जो आज भले हमारी चर्चा का विषय न हो किन्तु उनका कर्म महान रहा है जिन्होंने वचन की पूर्ति के लिए अपना सब कुछ दान कर दिया जिसे' दानवीर कर्ण' के नाम से भी जानते हैं

 कर्ण - कहने को एक सूत पुत्र किन्तु असल में सूर्य पुत्र कर्ण जिसने अर्जुन जैसी ही धनु विद्या ग्रहण की किन्तु एक सूत पुत्र का धब्बा लगने के कारण

 उसे अर्जुन जितना सम्मान न मिल सका

 परंतु तब  भी कर्ण ने  अपनी माता कुंती के आदेश को मानकर  स्वयं का जीवन दाव पर लगा दिया उस माँ के लिए जिसने उसे समाज के डर  से  कभी उसे  अपना पुत्र कहा ही नहीं  कर्ण जीवन कितना कठिन था इसे हम इसे समझ सकते हैं कि वो प्रतिभावान होकर भी सम्मान को प्राप्त न कर सके किन्तु उन्हें अपने कर्म से सभी को कर्तव्य परायणता की वो सीख दी जिसके आगे सब बौने है.

 जिस पर गीता का ये श्लोक भी बना है

 ' पश्चिम से सूरज उगे दिन बन

 जाए रात किंतु कभी मित्र

 से कर्ण करेंगे न घात'

दूसरा पात्र सभा में हर अनुचित चीज की आवाज़ उठाने वाले विधुर जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया

 विधुर- महाभारत का सबसे प्रभाव शील पात्र जिसने हमेशा निभय होकर गलत के खिलाफ आवाज उठाई 

 जिन पर गीता का ये श्लोक भी है

 " विधुर धर्म के साथ चुका रहा है

 मोल अपने पद त्यागता अपनी आंखे खोल'

तीसरा पात्र द्रोपदी जिसने भले बचपन को न देखा हो किन्तु संसार के हर दुख को उसने भोगा भले वो पुत्र वियोग हो या भरी सभा में उसका वस्त्र हरण हो 

 द्रोपदी- जिसे हम पंचाली के नाम से भी जानते हैं जिसके पिता ने एक तरफ अपनी पुत्री को सबसे सुंदर होने का वरदान मांग वहीं दूसरी और संसार के सारे दुख उसे मिले ऐसी कामना की  

जिसने बचपन को न देखा हो  किन्तु उसने जीवन के हर दुख का दर्द  स्वाद लिया  जिसकी हर जगह परीक्षा हुई 

भगवान श्रीकृष्ण द्रोपदी को समझाते हुए कहते हैं कि 

" मत रो बहन द्रोपदी जीवन है संग्राम

 धीरज धर मन शांत कर पूर्ण होगें सब काज"

चौथा पात्र युधिष्ठिर जो धर्म के सच्चे गुरु हैं जो धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं जिन्होंने अपने और पराए में कभी भेद नही किया

 युधिष्ठिर- जिनके लिए धर्म के आगे कुछ नहीं था जो जीवन को एक अलग नजरिये से देखते हैं जिसे हम इस तरह से समझ सकते हैं कि प्रश्न के जवाब में युधिष्ठिर कहते हैं कि आज संसार की सबसे

 आश्चर्य जनक बात ये है कि दूसरों को मरता हुआ देखा लोग ये सोचते हैं कि हम अमर है.


महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण पात्र  श्री कृष्ण जो 

अपनी लीलाओं से सबका दिल मोह लेते हैं और 

महाभारत के युध्द के समय अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हैं

 श्री कृष्ण- एक मानव का जीवन कितना कष्टदायी होता है इसे दिखाने के लिए स्वयं विष्णु के अवतार  ने कृष्ण के रूप में  धरती पर जन्म लिया जो और महाभारत में धर्म का साथ दिया जिन्होंने एक सामान्य नर की तरह आशीर्वाद और श्राप को ग्रहण किया श्री कृष्ण चाहते तो वो 

दुर्योधन की माँ के श्राप देने से पहले उन्हें रोक सकते किन्तु उन्हें एक माँ की महत्ता को बताने के लिए ऐसा नहीं किया 

महाभारत के बाद धर्म वीर भारती का लिखा हुआ अंधायुग बहुत चर्चा में रहा है जिसने महाभारत को एक नया विचार दिया है वही वर्तमान समय की महाभारत श्रीलाल शुक्ल के द्वारा लिखित राग दरबारी है जिसने व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान समय की महाभारत का वर्णन किया.

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