एक बच्चा जब चलना सीखता है तो उसे किसी व्यक्ति के सहारे की जरूरत होती है जो उसे गिरने से बचा सके और आगे चलने की ओर उसे प्रेरणा दे सके धीरे -धीरे वहीं बच्चा जब बड़ा होने लगता है और एक पेड़ की भांति वो बढ़ते चला जाता है इसे बेखबर की दुनिया में आगे निकलती जा रही है देश में मंहगाई बढ़ती जाती है राजनीति का मुद्दा बदलता जाता है राजनेता की नियत बदल जाती है
तब वो बच्चा आंखों सपने लिए आगे बढ़ता चला जाता है और समय निकलता जाता है धीरे - धीरे जब उस बालक का नए - न ए लोगों से परिचय होता है तब वो जानता है कि
ये दुनिया क्या है इसमें रहने वाले लोग कौन है
वो बच्चा अपनी आखों में सपने गढ़ने लगता हैं कि वो क्या बनना चाहता है और वो खुद को उस की तरह देखने लगता है ?
समय निकलता है और एक समय ऐसा आता है जब उस बच्चे का परिचय खुद से होता है जहाँ उसे मालूम चलता है जिस सपने को पूरा करने के लिए वो आगे बढ़ रहा है यकीनन उस चीज पाने के लिए उसे धैर्य रखना होगा साथ ही उसे कर्मयोगी होना होगा तब ही वो अपने ख्वाब को पूरा कर पाएगा
और वो बच्चा बच्चे से कब एक बालक -बालिका का रूप ले लेता है वो स्वयं उसे अनजान रहता है
फिर आता उसके जीवन का वो छड़ जब उसे जीवन के उद्देश्य को देखते हुए कुछ चुनना होता है
जब व़ो चुनाव कर लेता है तब वो अपनी जिंदगी में उस ख्वाब को पूरा करने के लिए आगे बढ़ता है जहाँ उसका मुकाबला अन्य लोगों से बाद में स्वयं से पहले होता है
जहाँ उसे हाथ पकड़कर चलाने वाला कोई नहीं होता है
उसके चलने वाले पैर तो वही होते हैं किन्तु उन्हें सहारा देने वाले वलिद काफी पीछे छूट जाते हैं आगे बढ़ते - बढ़ते वो जिंदगी के कुछ अच्छी बुरी यादों को पीछे छोड़ते आगे निकल जाता हैं
यहाँ उसकी हालात एक दो पहिया वाहन की तरह हो जाती है जिसका एसकीलेटर और ब्रेक दोनों उसे ही पकड़कर कर कच्ची सड़क पर चलाना होता है जहाँ उसका हाथ कितना उसे संयम के साथ गाड़ी का एसकीलेटर और ब्रेक का उपयोग करने देता है ये उसके मस्तिष्क पर निर्भर करता है
जब ठान ली पर्वत ने
खुद को एक नया आकार देने
की आश
तो क्यों रखना जिंदगी से कोई टकराव
ढेरों पाबंदी के बीच आगे चलते रहना
बिना अपने पांव की थकान को जानें
चाहें ऐसा करते पड़ जाए पैर में छाले
जब तक हो चलने की हिम्मत बिना रूके चलते रहना.
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