हम नहीं सोचेगें तो कौन


बात अगर हमारे हक की आती है तो हम अपने हक को मांगने के कोई कसर नही छोड़ते ऊंची चोटी का जोर लगा देते हैं और  शासन से मांग करते हुए कहते हैं कि हमारे हक की चीजें दीजिए किन्तु जब वहीं हमें कल के भविष्य के लिए कुछ बेहतर  देने की बात होती है तो हम, उसके लिए  जान न पहचान चले है प्यार करने जैसी बातें करने लगते  हैं

आज देश में प्राकृतिक संसाधन का उपयोग जमकर हो रहा है जिसमें बात ऊर्जा ,जल  ,कोयले   और वनस्पति की हो, जिसकी लूट मंची है हम विचार ही नहीं कर रहे हैं  कि इसके संसाधन खत्म होने पर हम कहाँ जाएगें, 

आज तो केवल अवाम की जनता में  इस बात की भाग दौड़ मची है कि कौन किसे आगे जाता है संसाधन को हरण करने में हर चीज अपने में काबिज करने में 

बिना जंगलों की खैरियत जानें बगैर, बिना साधन की खैरियत जाने बगैर

सब कुछ लूट जा रहा है

आज से 50 साल  के बाद आप में से  कितने लोग रहेगें ये भविष्य के गर्भ में है किन्तु हम अपनी भावी पीढ़ियों के लिए क्या ऐसा कुछ छोड़ पाएगें  जिसके वो हकदार है ये हम पर  निर्भर करता है भले व़ो स्वच्छ जल, स्वच्छ वातावरण 

ही क्यों न हो ये हमारे आज के सोचने पर निर्भर करता हैं 

किन्तु हम सब को इस बात पर जरुर विचार करना होगा कि भारत की सबसे समृद्ध अगर कोई सभ्यता थी वो " हड़प्पा सभ्यता " थी जो सबसे ज्यादा समय तक जिंदा रही है जिसके  प्रमाण आज भी हमें देखने वो मिलते हैं आज ये 

अनुसंधान का विषय होना बहुत जरूरी है कि उनके जीवन जीने की पूरी शैली कैसी थी जिसके चलते वे इतने लम्बे समय तक जीवित रहे हैं .

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