भारत में भूमंडलीय करण का दौर भले ही 1990 के बाद माना जाता है किन्तु उसकी शुरूआत तो भारत में 16 शताब्दी में ही हो गयी थी जब भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी में आयी थी ये बात और थी कि उस समय भारत ब्रिटेन का एक उपनिवेशवाद था जिस पर ब्रिटेन ने हुकूमत की थी.
किन्तु आजादी के बाद भारत अपने एक अलग अस्तित्व के रूप में आया जहाँ भारत एक देश के रूप आया जिसके सामने अनेक चुनौती थी अगर उस समय में भारत में वैश्वीकरण होता तो शायद भारत में बड़े रूप में लोगों में असंतोष फैला जाता है कहते हैं 'आवश्यक ता आविष्कार की जननी है 'भारत में 1980-90 के बीच में भुगतान संतुलन की ऐसी परेशान खड़ी हो गयी जिसका मुख्य कारण विदेशी मुद्रा का खत्म हो जाना और बाहर से अधिक आयात करना था.
भारत में नरसिम्हा राव की सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए या कहा जाए तो भारत की ऐसी स्थिति से निकालने के लिए जब भारत को रिर्जव बैंक का सोना गिरवी रखने की नौबत आ गयी "नयी आर्थिक नीति "लानी पड़ी जिसका लोगों ने स्वागत कम और आलोचना ज्यादा की और कई आलोचकों ने तो ये भी कह दिया कि ये नयी आर्थिक नीति केवल अमीरों के लिए है ये केवल बड़े उघोगपतियों की जेब भरने के लिए लायी गयी है कि किन्तु इस नयी आर्थिक नीति ने भारत की अर्थव्यवस्था के द्वारा सभी के लिए खोल दिया बड़े रूप में भारत में निवेश करने के लिए विदेशी कम्पनियों को आकर्षित करने वाली छूट भी दी गयी है
भारत का एक दौर नयी आर्थिक नीति के दौर में बीता.
किन्तु 2008 में अमेरिका जैसी बड़ी महाशक्ति की अर्थव्यवस्था में संकट छा गया लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में उसका ज्यादा असर नहीं दिखा जिसका कारण भारत में बड़े रूप में असंगठित क्षेत्र का होना था और भारत की अर्थव्यवस्था में नुकसान नाममात्र का हुआ.
किन्तु कहते हैं संकट के बादल देश में तब छाए जब देश में 2020 में कोरोना वायरस की महामारी ने दस्तक दी
और भारत की अर्थव्यवस्था क्या बड़ी -बड़ी अर्थव्यवस्था को भी बहुत झटका लगा कोरोना, लॉकडाउन ने सभी लोगों को घर में रहने को मजबूर कर दिया
जिसका असर हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित में हुआ है.
वहीँ भूमंडलीय करण भी अपने देश तक एक समय तक के लिए सिमट कर रह गया जिसका एक कारण अर्थव्यवस्था का भीतरी रूप में लॉकडाउन तो दूसरा लोगों की आवश्यकता सीमित रहना था जहाँ लोग केवल जरूरत की चीज के अलावा कुछ खरीद ही नहीं रहे थे किन्तु निराश के बादल वैक्सीन के आने के बाद छटने लगे मॉडर्ना थेराप्युटिक्स एक अमरीकी बॉयोटेक्नॉलॉजी कंपनी हैब्रिटेन दवा कंपनी फाइजर-बायोएनटेक के कोरोना टीके को मंजूरी देने वाला दी और वो दुनिया का पहला देश बन गया वही दूसरी ओर विकासशील देशों में भारत के सीरम इंस्टीट्यूट और ब्रितानी फ़ार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राज़ेनेका के सहयोग से बनी कोविशील्ड वैक्सीन और कोवैक्सीन भी आशा की नयी किरण लेकर आयी .
किन्तु इन सब के बावजूद एक रिपोर्ट ने सब का ध्यान चीन की ओर कर दिया जहाँ
संयुक्त राष्ट्र के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, चीन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में दुनिया का शीर्ष देश बन गया है जिसमें उसने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया
लेकिन समय का पहिया घूमता जा रहा है वैक्सीन के मामले में कुछ देश भारत की ओर आशा के साथ देख रहे हैं
हाल ही में आए बजट 2021 को देखकर हम ये अनुमान लगा सकते हैं कि भारत में जल्द ही विदेशी निवेश व्यापाक रूप में बढ़ेगा क्योकि भारत ने विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपनी नीति उदार कर दी.
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