बहुत पहले मैने एक व्यंग्य पढ़ा था जिसका शीर्षक " अगर नाक न होती थी" जिसमें एक बात मु झे सौ गुना सच लगी कि हमारे यहाँ नाक को लेकर हर तरह के मुहावरे बनाए गए हैं जिसमें ' नाक झुक जाना ' शार्मिदा होना ' नाक कट जाना ' बदनामी होना ' नाक भौह सिकोड़ना ' मुह बनना जैसे मुहावरे अक्सर हम सुनाते हैं आज भी अपनी नाक ऊंची रखने के लिए लोग कितना त्याग कर देते हैं केवल इस लिए कि समाज में हमारा सम्मान कम न हो.
हमारे यहाँ नाक को क ई उमा भी दी गयी है .
ये तो भविष्य के गर्भ में है कि आने वाले समय में ल़ोग समाज में अपनी नाक ऊंची रखने के लिए अपने सपनों और ख्वाहिश का कितना बलिदान देते हैं फिर भी आज के समय में नाक ऊंची रखने के लिए लोगों का बड़ा संघर्ष चल रहा है जो एक गम्भीर लेखक को ये शीर्ष क कहने को मजबूर करता है कि ' अगर नाक होती ' तो क्या कल्पना की जाती सम्मान आत्मसम्मान, त्याग बलिदान की.
सोचिए आप और हम अगर नाक न होती तो कैसे होते हम??
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