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काबिलियत नहीं देखती


सपने पूरा करने के लिए जीना और हर दिन उसे पूरा करने का जुनून रखना आसान काम नहीं होता है 

ऐसे में वो लोग जो किसी तरह की कोई बीमारी  के शिकार है उनके लिए सपने पूरा करना (हाथ पर सरसों जमाना है) असम्भव काम को सम्भव करना है 

हमारे सामने गुजरते वो लोग जो खुद को हर दिन बेहतर करने के अपनी शारीरिक अक्षमता से हार नहीं मानते बल्कि अपने जुनून से अपने सपनों को पूरा करते है

ऐसे लोगों में एक नाम जिनका अभी हाल में जनवरी में निधन हो गया है वेद मेहता जो पेशे से एक लेखक थे उन्हें एक बीमारी के चलते 3 साल की उम्र में अपनी आंखों की रोशनी खो दी किन्तु अपने सपनों को मरने नहीं दिया और उनका जन्म भले सरहद के उस पर पूर्व लाहौर में 1934 को एक पंजाबी परिवार में हुआ किन्तु उन्होंने अपने सपनों की उड़ान भरने के लिए अमेरिका छलांग लगायी और वहाँ शिक्षा ग्रहण की 

और उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद लेखन कार्य में अपना जीवन समर्पित किया जिसके लिए उन्होंने अमेरिका में सम्मानित भी किया गया.

उन्होंने कुल 24 किताबें लिखी है जिसमें उन्होंने संस्मरण भी लिखा . 

उन्होंने कभी अपनी दृष्टि हीनता को अपनी सफलता के आगे आने नहीं दिया और अपने आस पास के वातावरण के बारे में लेखन कार्य किया.

वो भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप में जीवित न हो किन्तु उनका लिखा साहित्य अमर रहेगा.

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