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बुरा जो देखन में चला


कबीर हिन्दी साहित्य में बहुत अहम भूमिका रखते हैं उनके दोहे हो या उलटवाँसियां वो हर चीज में वास्तविकता को ऐसे रखते हैं कि पाठक वर्ग ये सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि ये कैसा लिख दिया गया.

कबीर का एक दोहा आज के समय में बहुत विचारनीय है जो कि 

' माटी कहे कुमार से क्या रोधे तु म्योही एक दिन ऐसा अबेगा में रोधूगी तुही'

इस के माध्यम से कबीर ये कहने की चेष्टा कर रहे हैं कि जिस तरह तु मुझे रोध रहा है मेरे अस्तित्व को खत्म कर रहा है एक दिन तुझे उस ही मिट्टी में मिल जाना है 

आज समकालीन समय में जहाँ न बाग न वन कुछ भी शेष नहीं रहने दिया जा रहा है सभ्यता को विकसित करने के नाम पर हर जगह मनुष्य अपना अधिग्रहण कर रहा है और अगर उसे ऐसा करते हुए कुछ जीव जानवर मिल जाते हैं तो वो कहता है कि लोग हमारे घर में घुस रहें हैं जबकि वास्तविकता ये है हम लोग उनके घर पर घूस रहे हैं

आज अवाम की जनता में बड़े राजनीतिज्ञ ये डंका बजा रहे हैं कि हम अच्छे और वो बुरे हैं 

जबकि जनता सब कुछ जानती है

जिस पर कबीर का दोहा सच लगता है

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।। कौन अच्छा कौन बुरा है

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Today Thought

कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

life real meaning thought

पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..