जब जिंदगी जी रहे हो तो
थोड़े जख्म से पांव तुम्हारे क्यों रूकते है
क्या कभी बिना असफल हुए
किसी के ख्वाब सच होते हैं,
जी रहे हो जिंदगी तो जीते हुए दिखाई दो
वरन् रोते हुए तो हर शख्स इस दुनिया में मौजूद रहते हैं
खुद के लिए अगर नही खड़े हो सकते तुम
तो क्या जिंदगी को जी रहे हो तुम?
कोई कुछ कहे तुम्हारे बारे में
जब अकेले ख्वाब देखे तुमने
फिर क्यों गेरौ की बातों से मुंह फुलकर बैठे हो,
जिंदगी नहीं होती किसी की फूलों पर चलने जैसी
कांटो पर चलने वाले को ही मिलती है मंजिल उनके जैसी
जख्म हरे रहने दो
तुम घाव के
याद आए ताकि तुम्हें निशान पांव के,
जब जिंदगी जीना है तो अपने लिए जीओ
क्या पता कल की शाम तुम जीओं
या न जीओं,
दुनिया जमाने की फिक्र करते हो
जमाना क्या जाने तुम्हारे जुनून को
थोड़ी और मेहनत कर लो
साहसी नौजवानों .
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