जिनके लिए बस में सीट से लेकर घर में प्राथमिकता कोई चीज ही नहीं यहाँ तक कि उनके रोने पर उन्हें खाना दिया जाता है जिस पर कहावत तक बनी है कि बच्चे को भी रोने पर ही दूध मिलता है .
बच्चे को भले ही हम बच्चा कहकर नजर अंदाज कर दे किन्तु वो कभी हमें नजर अंदाज नहीं करते वो इस तरह से अपने काम को करते जिस देखकर हम भी हैरान रह जाते हैं कि वो अपने काम को कितने बेहतर ढंग से करते हैं न किसी तरह का आलसी पन और न ही किसी चीज की गैर जिम्मेदारी भरी हरकत व़ो शरारत भी इतने मनमोहक ढंग से करते हैं कि उन पर चिल्लाना भी व्यर्थ लगता हैं.
हम बचपन की अवस्था में अपने काम को लेकर जितना सजग रहते हैं उतने किसी उम्र में नहीं हालांकि बुढ़ापा और बचपन दोनों ही व्यक्ति को किसी न किसी पर निर्भर करने को मजबूर करता है जैसे बुढ़ापे में पेंशन का और बचपन में माँ और पिता के लाड़ प्यार का ये बात थोड़ी अलग है कि पिता से ज्यादा बच्चे माँ पर निर्भर रहते हैं किन्तु ये बात कहना गलत होगी कि वो पिता अपने बच्चों से स्नेह नहीं करते जिनकी व्यस्तता इतनी होती है कि बच्चे को रोता छोड़ ऑफिस भागने की प्राथमिकता होती है.
किन्तु ऐसा नहीं है पिता स्नेह नहीं करते अपने बच्चों से वो स्नेह करते हैं किन्तु बच्चों को जताना नहीं जानते.
आज समकालीन समय को देखे तो बच्चे पर ध्यान कम देने की वजह से वो हमसे काफी हद तक दूर होते जा रहे हैं इसलिए बच्चों पर ध्यान देना भी प्राथमिक समझे आप उन्हें ज्यादा नहीं थोड़ा वक्त उनके साथ बिताइए वो आपसे पैसा नहीं वक्त चाहते हैं इस आप समझाइए।
हम बोलते नहीं इस मतलब ये नहीं
मम्मा पापा हम समझते नही
आप हमें किस तरह से नजर अंदाज करते हैं
हम भी स्नेह चाहते हैं आपके प्रेम का
थोड़ा सा ही आप से दुलार चाहते हैं
याद करो आपको भी दुलारा होगा आपकी माँ और पापा ने
क्या हम इतने बे गुजरे हो ग ए
कि आप हमें समय देना ही भूल गए
हम भी स्नेह की लालसा रखते हैं आप से .
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