चोट


 हमें कोई न कोई चोट तो लगती ही रहती है किन्तु जब चोट लगे और दर्द होना बंद हो जाएं तब हमें ये संकेत मिलते हैं कि अब हम परिवर्तन की ओर बढ़ चुके हैं और अब हमें चोट से दर्द नहीं होता हम बदल चुके हैं . 

हम बचपन से लेकर बूढ़े होने तक अनेक तरह की चोटें खाते हैं जिनमें कुछ चोटों के जख्म तो ऐसे होते हैं जो किसी को भले ही दिखाई न दे किन्तु उनका दर्द हमारे भीतर होता है और कुछ चोट के जख्म जो हमें दिखते हुए भी नहीं दिखाई देते हैं क्योंकि व़ो जख्म भले ही न मिटे हुए हो किन्तु उसका दर्द अब गायब हो चुका होता है.

हमारी जिंदगी में हमेशा उतार चढ़ावा आते रहते हैं जिसमें हम क ई जख्म भी खाते है किन्तु इन जख्म को देखकर भी जो अपना धैर्य न खो पाएं वो ही कुछ कर पाते हैं.

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