आज जहाँ एक तरफ भारत का किसान जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है जिसे भारत का अन्नदाता कहा जाता है आज उसके सामने जो नियम कानून लाए जा रहे हैं वो उसकी फसल के वास्तविक मूल्य की तुलना में ' ऊंट के मुंह जीरा' समान है जिसका वो विरोध कर रहे हैं किन्तु ये बड़ी दुर्भाग्य की बात है कि टी वी चैनल से लेकर अखबार तक में उसकी खबरें नाममात्र की है.
लोकतंत्र लोग के द्वारा लोगों के लिए बनाया गया शासन जिसे लोकतंत्र कहते हैं आज वो खत्म सा होता दिखाई दे रहा है.
आज समकालीन समय में फोन खोलने से लेकर सोशल मीडिया प्लेट फार्म को देखकर लगता है कि देश में सबकुछ अच्छा है जबकि परिस्थितियां इस से भिन्न है .
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