जब इरादे मजबूत हो तो डर कैसा फिर न साथी की जरूरत होती है और न साथ की .
हम जब भी कोई काम करने के लिए एक पैर आगे रखते हैं तो हमें लगता है कि हम ऐसे लोगों के साथ हो जाएं जिनके सपने हमारी तरह है जो हमारी तरह उस ही रास्ते पर चलते हो जिस पर हम चलते हैं जबकि ऐसा होता ही नहीं है.
' अक्सर हम दुनिया की भीड़ में होकर भी अलग ही रह जाते हैं और बचता है तो सिर्फ अकेलापन कोई इस अकेलेपन को अपना साथी बना लेता है तो कोई उसकी कमी के चलते अपने क ई काम को करना छोड़ देता है आगे वो ही चलता है जो अपने दिल की सुनता है.
लेखक रवींद्र नाथ टैगोर ने बंगाली भाषा में देशभक्ति के लिए एक गीत लिखा है जिसका प्रारंभ
' तबे एकला चलो रे ' से होता है
जिसमें गीत शुरू होते ही
" जोदि तोर दक शुने केऊ ना ऐसे तबे एकला चलो रे" जिसका हिन्दी अर्थ ( यदि तुम्हारी बात का कोई उत्तर नहीं देता है तब तुम अपने तरीके से चलो)
आज समकालीन समय में जब हर जगह एक प्रतियोगिता चल रही है हर कोई किसी न किसी प्रतियोगिता का हिस्सा बना हुआ है किन्तु इसमें जीतने के लिए आवश्यक ता है उसे खुद के साथ और भरोसे की जहाँ वो "एकला चले".
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