हर दिन की तरह सुबह आज भी वैसे हुई जैसे पहले से होती आ रही है उसमें सिर्फ परिवर्तन इतना हुआ कि जिसने मुझे दाता और याचक पर विचार करने को मजबूर कर दिया.
वैसे तो दिवाली का त्यौहार सभी के लिए खुशी देने वाला होता है किन्तु कुछ लोग ऐसे भी है जिनकी दिवाली हमारे और आप के कुछ पैसे या दिवाली के मौके पर कुछ उपहार देकर होती है
कचरे की गाड़ी जो तीन दिन से हमारे यहाँ दिवाली के चलते नहीं आयी जिसके कारण आज लोग कचरे फेंकने के लिए बहुत उत्साहित से दिखाई दे रहे हैं जो उन लोगों में बहुत कम नजर आता है वैसे तो हर बार ही दिवाली के बाद हम लोग उन लोगों को कुछ पैसे और घर के कुछ पकवान देते है किन्तु इस बार थोड़ा परिवर्तन सा दिखाई दिया कुछ लोगों ने उन्हें पैसे दिए तो कुछ लोगों ने उन्हें प्रसाद के रूप में घर के बने पकवान दिए जब मैंने उन्हें प्रसाद के रूप में अपने घर से कुछ पकवान और मिठाई दी तो मन में एक अजीब सा सुकुन हुआ और एक तसल्ली सी उस मैं दिखाई देने लगी जिसने मुझे दाता और याचक पर सोचने के लिए जोर दिया.
हम आप दाता बने या याचक बने इसे ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि हम जिस भूमिका में खड़े उसमें खुश है कि नहीं
" आज सब लोग अपनी जगह दाता और याचक बने है अब ये हमें निश्चय करना है कि हम दाता बनते समय कितना किसी व्यक्ति को दे सकते है".
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