मरना तो है ही एक दिन
क्यों मरते हो तुम हर दिन
तुम क्यों भ्रम में जी रहे हो
कि तुम भीष्म हो
तुम तो हो एक पेड़ जो
आज हरा कल सूख जाएगा
मरना तो है ही एक दिन,
आज तो तुम उस पेड़ की तरह हो
जिस पर फल लगने पर कितने पत्थर पड़ते हैं
क्या वो जीना छोड़ देता है
जो प्रगति की ओर बढ़ता है
उसी पर तो दुख का पहाड़ टूटता है,
वो जिंदगी को क्या जीना कहेगे
जहाँ न दी तुमने किसी
कुछ सीख,
तो जीवन भी क्या जीवन
जहाँ जीने और मरने नहीं है कोई अंतर शेष,
जीने के लिए दम चाहिए
क्या दीपक ने साहस जुटाया
हवा तो आती रहती जोर शोरो से
किन्तु दीपक फिर भी न बुझ पाया,
हवा तूफान से डरना कैसा
इसी ने तो जीवन जीना सिखाया
मरना तो है एक दिन
आज फिर दीपक
जोरों की हवा से बूझ न पाया .
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