ये कैसा समाज हमने रच है डाला
जहाँ बेटी को कोई नहीं पूछने वाला
बेटे की चाह में कितनी बेटी क़ो
पैदा कर
उसका गला है घोट डाला,
जहाँ माँ माँ न रह गयी
जहाँ पिता पिता न रह गया,
समाज से बेटी है पूछती
क्या बिगाड़ा उसने किसी का
जहाँ आज कोई नही उसका पूछने वाला,
जहाँ सड़क हर दिन
किसी लड़की की इज्जत
आबरू गिरते देखती ,
हर बार किसी निर्भया के साथ
ऐसी दरंगी होती रहती,
जहाँ गर्भ में बेटी माँ से है बोलती
माँ अच्छा होता कि तु मुझे गर्भ में ही मार देती
ये दुनिया नहीं बेटियों की,
जहाँ बेटों की चाहत में बेटी
जन्म के बाद
किसी कचरे के डिब्बे में फेंकी
होती,
या किसी की वासना का शिकार होकर वो अपने आप को खोती,
कभी हर बात पर हंसने वाली बेटी
आज अपने बेटी होने पर रोती,
क्या मिलेगा उसे इंसाफ कभी
ये पूछा रहीं एक बेटी अपनी माँ से होती?
माँ क्या बोले इस पर उसे जिसने हमेशा उसे गलत के लिए आवाज उठाना तो सिखाया,
किन्तु कभी तेरा साथ अगर गलत हो तो तु आवाज उठना ये तो माँ
ने कभी बोला ही नहीं,
ये आज हमने कैसा समाज रचा
जहाँ किसी दौपदी की लज्जा
आज किसी दुयोधन से न है बचती,
जहाँ सीता हमेशा के लिए
वनवास में ही रहती,
जहाँ कुन्ती की एक गलती
न जाने कितने कर्ण को मिलती
बेटी अच्छा होता तु इस दुनिया में कदम ही ना रखती.
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