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पुस्तक समीक्षा


सरकारी तंत्र पर तंज कसती है राग दरबारी

भारत गांवों का देश है जहाँ कि अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है जहाँ आज भी चुनाव के समय राजनीतिक पार्टी किसानों की तारीफ करते हुए कहते हैं कि आप ही इस देश की आधारशिला है.

श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी शहर से दूर गाँव शिवपालगंज पर आधारित है जिसका मुख्य पात्र रंगनाथ है जो रिसर्च करता है जो शहर से दूर अपने रिश्तेदार के घर शिवपालगंज में अपनी थकान कम करने आता है.

जहाँ पर आते वक्त रास्ते में ही उसे दिखाई देता है कि सरकारी तंत्र पूरी तरह से विकलांग हो चुकी है जहाँ कोई भी काम बिना पैसे दिए नहीं होता जहाँ जिसके पास पैसा है वहीं ताकतवर है.

  राग दरबारी के माध्यम से

शुक्ल ने गाँव से लेकर सरकारी काम काज की व्यवस्था पर प्रश्न उठाया है  

तो वहीं दूसरी ओर उन्होंने स्कूल की शिक्षा प्रणाली और अफसरों की चाटूकारिता को बताया है.

इसकी भाषा शैली में मुहावरे का उपयोग बहुत सही तरीके से किया है जैसे चोखा काम, चोखा दाम 

 तो वहीं दूसरी ओर इसमें ग्रामीण भाषा का तो उपयोग किया ही गया है साथ ही साथ इसमें देशज और विदेशज शब्द की भी भरमार है जो इसमें चार चांद लगाती है 

राग दरबारी गाँव की व्यवस्था, समाज का आचरण, प्रशासन के कार्य और शिक्षा देने के तौर तरीकों को बताती है.

आज समकालीन समय में भी चीजें बिल्कुल रागदरबारी जैसी ही दिखाई देती है फर्क इससे पड़ता है कि आप उसकी वास्तविक ता को जानने के इच्छुक है कि नहीं.


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