क्या सोचा तुमने कभी
आज को जीने वाले मुसाफिर
क्या तुमने देखा कभी
बिना मेहनत के किसी ने
चैन की रोटी
खायी,
मुफ्त के पैसे से न जाने
कितनों ने मौज उड़ाई है
किन्तु नींद अच्छी मेहनती
इंसान को ही आयी है,
बाहर की रौनक भले ही
कितनों को आकर्षित करें
किन्तु चैन बंसी सब ने
अपने घर पर ही बजायी है.
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