एक समान फिर भी आज तक क्यों
किसी ने तेरे लिए परिभाषा न गढ़ी,
गीतों में संगीतों में तु
आया हर रीतो में तु
क्यों आज तक है किसी ने न गढ़ी
हर किसी के पास होता है तु
लेकिन फिर भी तेरी सुध किसी ने न ली
तु न हो तो जीवन क्या
तु न हो तो मृत्यु का,
तेरी कमी की शिकायत सब को है खली
लेकिन तब भी तु शान्ति से अपने घर को चली
घड़ी तेरे बंद होते ही न जाने कितने की
सांसें बढ़ी चढ़ी ,
समय तेरी खबर आज किसी ने न ली.
Comments