राग दरबारी
पुस्तक समीक्षा
परिचय
रागदरबारी मुख्य रूप से शहर से दूर एक गाँव जिसका नाम शिवपालगंज है
उस पर आधारित है
इसमें बताया गया है किस तरह गाँव में आज भी ज्यादा कुछ नहीं बदला लोग अपने काम को घूस देकर ही करते हैं जहाँ स्कूल कालेज खुले जरूर है किन्तु उनमें वो शिक्षा कम ही दी जाती है जिसकी उनको जरूरत है.
श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी के माध्यम से न सिर्फ समाज की अनेक विषमता को व्यंग्य के साथ बताया है बल्कि समाज पर एक तरह का तंज भी कसा है जिसका मुख्य किरदार बाबू रंगनाथ है जो शहर से गाँव घूमने आता है जहाँ वो हर चीज को देखकर बड़ा अचम्भित होता है जहाँ बच्चे को स्कूल से लेकर घर तक एक अलग ही पाठ पठाया जाता है
जहाँ राजनीति से लेकर गाँव का साधारण व्यक्ति भी किस तरह से किसी सत्ता से प्रभावित है वो उसे स्पष्ट तौर पर देखता है .
भाषा शैली
इसकी भाषा शैली में मुहावरे का उपयोग बहुत सही तरीके से किया है जैसे चोखा काम, चोखा दाम
तो वहीं दूसरी और इसमें गामीण भाषा का तो उपयोग किया ही गया है साथ ही साथ इसमें देशज और विदेशज शब्द की भी भरमार है जो इसमें चार चांद लगती है
मुख्य बिंदु पर चिंतन
राग दरबारी गाँव की व्यवस्था, समाज का आचरण, प्रशासन के कार्य और शिक्षा देने के तौर तरीकों को बताती है.
और ऐसे अनेक पहलुओं को एक साथ जोड़ती है जिन्हें अक्सर हमने कही न कही देख है.
साहित्य में स्थान
हमारे हिन्दी साहित्य में हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों व्यंग्य के माध्यम से न सिर्फ अपने पाठकों का मनोरंजन किया है बल्कि अपनी लेखनी के जरिये समाज की वास्तविक ता को दिखाने का प्रयास भी किया है.
उपसंहार
आज समकालीन समय में भी चीजें बिल्कुल रागदरबारी जैसी ही दिखाई देती है फर्क इसे पड़ता है कि आप उसकी वास्तविक ता को जानने के इच्छुक है कि नहीं.

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