आज क्यों भूल रहे हैं तुझे



संस्कृत  जो  समस्त भारतीय भाषाओं की मांं   है   हमारे पुराने ग्रन्थ, साहित्य  और  कलाओं का ज्ञान  भी इसी  भाषा में उपलब्ध है.

संस्कृत   व्याकरण प्रधान भाषा है  जिसे  देववाणी भी कहा जाता है जिस कारण  अनेक देवी देवताओं की वंदना भी संस्कृत भाषा में ही की गई है .

संस्कृत शब्द मुख्य रूप से 'सम्' उपसर्ग  तथा कृ धातु एवं क्त्  प्रत्यय  से मिलकर बना है  संस्कृत शब्द का शाब्दिक  अर्थ ' संस्कार की हुई ' जिसका  अर्थ उसके संशोधन  से है   इसे वेद भाषा और 'आदि भाषा' के नाम से   जाना जाता है.

आपको बता दे कि इसके जनक

स्वयं  पाणिनी  है इनके द्वारा लिखे गए ' अष्टाध्यायी ' नामक संस्कृत ज्ञान  है जिसमें  अनेकों सिध्दांत और सूत्र है जिसे 'संस्कृत व्याकरण' का नाम दिया गया है

संस्कृत भाषा  जो   कम शब्दों में  भी बहुत कुछ कह देती  है  जैसे 'विद्या  विनयम् ददाति विद्यया पात्रता याति'. जिसका हिन्दी अर्थ विद्या हमें विनय देती है विद्या से योग्यता आती है.

आज जहाँ एक ओर हम नए शब्दों को जान रहे हैं वहीं हम पुराने शब्दों को भूलते जा रहे हैं  हमें नयी चीजें जानी चाहिए किन्तु हम अपनी उन पुरानी भाषा को नहीं भूलनी चाहिए जिसने हमें बोलना सीखाया  और हमें भाषा का असली मतलब बताया.

आज भाषा के क्षेत्र में परम्परा कहीं छूटती सी नजर आ रही है

लेकिन आज भी संस्कृत के कई ऐसे श्लोक हैं जो  सदैव हमारे जीवन में  एक  अच्छे विचार के रूप में होगें .

जैसे

" नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभारणं गुन

गुणस्याभरणं ज्ञानं  ज्ञानस्याभरणं  क्षमा"

  जिसका  हिन्दी अर्थ मनुष्य का

गहना उसका रूप होता है रूप का गहना गुण होता है गुण का गहना ज्ञान होता है ज्ञान का गहना क्षमा होता है.

"रूपयौवनसंपन्ना  विशाल कुलसम्भवा :

विघाहीन  न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका :

जिसका अर्थ अगर तुम रूप  यौवनसंपन्न  और तुमने विशाल कुल में जन्म लिया है लेकिन अगर तुम ने विद्या आर्जित नहीं  कि तो तुम उस सुगंध रहित  केसुड़े के फूल के जैसे हो जो फूल होने के  बावजूद सुगंध नहीं दे सकता  है जिसका जीवन अर्थ हीन सा है.

*आचार्य जिसे आज हम आज टीचर कहते

श्यामपट्ट जिसे आज हम ब्लैक बॉड कहते

धेनु जिसे हम गाय कहते

जननी जिसे हम माँ कहते

लेकिन संस्कृत को  जिसे हम आज  भी सिर्फ संस्कृत है कहते.

मुझे गर्व है कि मैंने संस्कृत पढ़ा है उस भाषा को मेरा शत् नमन्.....



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