जीवन को देखने का अलग नजरिया देता है सेवासदन**



सुमन एक स्वाबलम्बी स्त्री है जो हमेशा जीवन को स्वतंत्र रूप से जीना चाहती है लेकिन वैसा जी नहीं पाती.
उसका पति गजाधर  उसके चरित्र पर शक करता है और एक दिन उसे आधी रात को घर से निकाल देता है  तब वो साधनहीन स्त्री एक वैश्या का काम करने को मजबूर हो जाती  है और सुमन कुछ समय में " सुमन बाई " बन जाती है.

लेकिन  समय   के साथ सुमन को ये जीवन  खराब सा लगने लगता है तब कुछ लोग ज़ो विधवा आश्रम चलाते हैं व़ो सुमन को उस आश्रम में आने को कहते हैं जिसके लिए वो राजी हो जाती है
 और वो  आश्रम  चली जाती है
वही दूसरी ओर सुमन की छोटी बहन  शान्ता जिसकी  शादी सदन से इसलिए टूट जाती है  क्योंकि उसकी बहन एक वैश्या   है.
समय बीतने के साथ सुमन अपनी बहन शान्ता का उसी लड़के के साथ विवाह करवाती है जिसे कभी सुमन भी प्रेम करती थी लेकिन अब वो शान्ता का पति है जिसे ने  शान्ता से इसलिए संबंध तोड़े क्यों कि उसकी बहन एक वैश्या है .
समय बीतने के साथ सुमन  शान्ता और सदन  का विवाह हिन्दू धर्म अनुसार करवा देती है और  सुमन सदन और शान्ता के साथ एक साथ रहने लगती  है.
किन्तु कुछ समय बाद उसे वहाँ से जाना पड़ता है.
सुमन वैश्या  सुधार आश्रम की शरण में जाती है
उस  आश्रम की देख रेख करती है और कुछ दिन में ही उस आश्रम का नाम  नक्शा बदल जाता है और उस आश्रम का नाम "सेवासदन " पड़ जाता है
 सेवा सदन में बालिका को पढ़ाई लिखाई के साथ बागवानी  ,सिलाई बुनाई भी सिखाई जाती  है.
सेवा सदन एक ऐसा सदन बन जाता है जहाँ पर चारों तरफ ज्ञान की नदियाँ बहती है ये सब एक ऐसी विदुषी की देन है जिसे हमेशा दुख दर्द ही मिले हैं.

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