आज मालूम चलती है घर से बाहर जाने की कीमत भले ही हम कितना भी थक जाएं पर हर दिन कल के आने का इंतजार रहता था भले फिर किसी को यूनिवर्सिटी जाने का हो या ऑफिस जाने का लेकिन आज उस समय और घड़ी की बहुत याद आती है जिस अलार्म घड़ी को हम कभी कोसते थे कि कितने जल्दी बज गयी क्या सुबह हो गयी ?
आज उसी अलार्म घड़ी को देखते हैं तो लगता है कि वो क्या दिन थे,कब आऐगे वो दिन लौटकर?
हमें हमेशा किसी भी चीज़ की कीमत तब ही मालूम चलती है जब हम उसने पाने में बहुत असमर्थ हो जाएं शायद इसलिए हमें कहा जाता है कि "आज में
जिए अब को जिओं कल किसने देखा."
जिए अब को जिओं कल किसने देखा."
आज इस गाने की तरह ही हमारी जिंदगी हो चुकी है-
** जिंदगी के सफर गुजर जाते हैं,
फिर नहीं आते हैं **
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