एक गरीब किसान जिसके पास मात्र दो बीघा जमीन के अलावा कुछ भी नहीं है ऐसे किसान शम्भू को एक महाजन
अपने काम के लिए उसे उसकी दो बीघा जमीन मांग लेता है
और जब वो मना कर देता है तो शम्भू को पूरा बकाया अगले दिन चुकता को कहता है वो अपने पैसे का हिसाब बेटे से लगवाता है जिसमें
65 रूपये वह घर के कुछ सामान और पत्नी के झुमके बेचकर महाजन को देने जाता है तब चतुर महाजन हिसाब कर 265 रूपये बता
देता है जो उसके पास नहीं होते हैं.
65 रूपये वह घर के कुछ सामान और पत्नी के झुमके बेचकर महाजन को देने जाता है तब चतुर महाजन हिसाब कर 265 रूपये बता
देता है जो उसके पास नहीं होते हैं.
कहानी अलग मोड़ लेती है वो कोलकता पैसे कमाने जाता है जहाँ वो रिक्शा चलाने वाला बन जाता है और खून पसीना एक कर पैसा कमाता है और जब उसके पास केवल पचास रूपये की कमी होती है तभी उसका पांव टूट जाता हैं और फिर उसका 12 साल का लड़का कन्हैया वो जूते साफ करने से लेकर चोरी करने तक के लिए विवश हो जाता है और जब शम्भू की पत्नी को यह सब मालूम चलता है तो वो कोलकाता आ जाती है लेकिन उसका भी एक दिन एक्सीडेन्ट हो जाता है और
ये मूवी गरीब किसान की परिस्थिति, महाजन की चतुराई, छोटी सी उम्र में बच्चे के काम करने की मजबूरी, पत्नी की विवशता को दिखती है.
प्रेमचंद के " सवा सेर गेहूं " में भी गरीब किसान शंकर को अपनी जिंदगी देकर कीमत चुकानी पड़ती है .
ये दोनों कहीं न कहीं बहुत मेल खाती है जहाँ दोनों अपनी किस्मत के मारे होते हैं.
"दो बीघा जमीन अपने उद्देश्य को दर्शको के सामने प्रस्तुत करने में पूर्ण रूप से सफल होती है.
इस मूवी में कही भी बनावटी पन नहीं झलकता है.
" आज के समय में इस मूवी की प्रासंगिकता किसान के जीवन में आज भी दिखाई सी देती है जहाँ पर आज भी कितने ऐसे महाजन है जो शंकर, शम्भू जैसे अनपढ़ किसान को लूट लेते हैं . "



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