पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था जिसने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की और वरदान स्वरूप ये मांग की कि मुझे कोई भी स्त्री और पुरुष के दूवारा नहीं मारा जाऐगा न दिन और न रात में मार जाऐगा न दरबार के अंदर और न बाहर मारा जाऐगा।
भगवान विष्णु उसकी सभी मांगो को पूरा कर देते हैं ।
वरदान पाकर हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान समझने लगता है और अपनी पूजा करने को कहता है।
उसका पुत्र प्रहलाद होता है जो दिन रात भगवान विष्णु की पूजा उपसाना करता है हिरण्यकश्यप उसे पसन्द नहीं करता और उसे समझता है लेकिन वो किसी की नहीं मानता जब हिरण्यकश्यप उसे मारने का आदेश देता है।
उसे गर्म कडाई में डाला जाता है लेकिन वो भगवान की कृपा से तेल भारी कड़ाई में फूल बरसाने लगाते हैं।
उसकी सारी योजना असफल हो जाती है।
तब हिरण्यकश्यप की बहन " होलिका " ये तरकीब सूझती है कि मुझे तो भगवान बाह्रा का वरदान प्राप्त है कि मैं अग्नि में नहीं जलूगी मैं प्रहलाद को लेकर बैठ जाऊगी ।
योजना अनुसार ये कार्य होता है होलिका अपने भतीजे को लेकर बैठती है प्रहलाद बच जाता है और होलिका का " वरदान श्राप में तब्दील हो जाता है।"
हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु " नरसिंह" का रुप लेते हैं और उसका अंत करते हैं।
" बुराई पर अच्छा ई की जीत होती है ".
तब से हम "होलिकोत्सव उत्सव" मनाते है।
भारतीय त्यौहारों की अपनी अलग पहचान है जिनका अपना महत्व है।
वर्तमान समय में हमें अपने त्यौहार को मनाने के साथ उनके महत्व को भी समझना चाहिए।

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