हमेशा क्या हमने ही सहने का ठेका सा ले लिया है कि हमारी गलती हो या न हो लेकिन हम ही सहे.
मेरे आंखों देखी बहुत से उदाहरण रहे हैं जहाँ पर बेवजह ही हमें डट दिया जाता है जबकि हमारी कोई गलती ही नहीं रहती
जरा गौर कीजिये मेरी इस बात पर कि आप किसी बड़े प्रोग्राम में शिरकत करने गये हैं और वहाँ पर आपके किसी परिवार के व्यक्ति ने जो आपको कभी कुछ नहीं कहता उसने आपको डंटा दिया आपने लोगों के सामने उनका सम्मान रखने के लिए कोई बात नहीं कहीं लेकिन बाद में थोड़ा कुछ कह दिया तो आपको भला बुरा कह जाऐ तो उस समय आप क्या कहेंगे.
हमेशा लोगों की बात सुना ही क्या हमारा काम रह गया है मैं ये नहीं कहती कि बात बात पर लड़की का गली देना सही है लेकिन उसका बिना गलती के सहना भी उतना ही गलत है हमें अपने लिए जगना होगा.
सुना है फेमिनिज्म बहुत चर्चा में है आप सबको याद दिलाना चाहूगी कि भारत में ये बहुत पहले से ही है भले बात झांसी की रानी की हो, यहाँ रानी अवतिका बाई की हो इस देश में शुरू से ही फेमिनिज्म रहा है.
हमारी पौराणिक कथाओं को ही देख ले जहाँ उन्हें युद्ध लड़ने से लेकर अपना मनपसंद वर चुनने की भी स्वतंत्रता रहती थी.
आज का फेमिनिज्म तो सिर्फ दिखवा है
" झीलों की राजधानी भोपाल को ही देख लीजिए जहाँ पर बेगमों ने राज किया "जिनमें सुल्तान बेगम,
सिकन्दर बेगम दूसरी बेगम थी जबकि उनकी माँ कुदसिया बेगम पहली महिला शासिका थी.
सिकन्दर बेगम दूसरी बेगम थी जबकि उनकी माँ कुदसिया बेगम पहली महिला शासिका थी.
सिकंदर बेगम ने राज्य में कोई कई सुधार किए जिसमें एक सचिवालय एक सासंद और एक आधुनिक न्यायपालिका का निर्माण शामिल है.
ं
ं
भोपाल की तीसरी बेगम शाहजहां इन्होंने भारत की सबसे बड़ी मस्जिद " ताल उल मस्जिद " बनवाई थी
.
समकालीन समय की परिस्थितियों को देखकर में सिर्फ इतना ही कहूंगी कि "अपना हक लेना सीखो ".
.
समकालीन समय की परिस्थितियों को देखकर में सिर्फ इतना ही कहूंगी कि "अपना हक लेना सीखो ".
Comments