पर्यावरण


" हमारे चारों ओर से घेरे हुए आवरण को पर्यावरण कहते हैं "

पर्यावरण को आज हम इतनी अहमियत नहीं देते केवल एक दिन दिखावे के तौर पर पेड़ लगा देते हैं फिर न तो अगले दिन उस पेड़ की खबर लेते हैं नहीं अपने आस पास के वातावरण की.

जैसे जैसे हम विकास करते जा  रहे हैं वैसे वैसे पेड़ो को काटा जा रहा है वनों की संख्या कम होती जा रही है जैसे हमें उसके लाभ तो पता ही नहीं है कि वनों के कारण वर्षा होती है, वनों से सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है, सौगोन और इमारती  लकड़ी की कीमत तो हम जैसे भूल ही गए हो.

यू तो मध्यप्रदेश में वनों की संख्या अधिक  है जैव विविधता उसकी अधिक है लेकिन अब वो कम होती नजर आ रही है केवल इसका कारण आधुनिकता का प्रवेश होना है.

आज वर्तमान समय में तो मुझें गाँव इस चीज में हम से  समझदार लगते है जहाँ लोगों से ज्यादा पेड़ पौधों की संख्या रहती है जब भी जाओं तो एक अलग तरह का सुकून मिलता है . 

आज इस कोरोना वायरस ने हमें कुछ दिनों के लिए जब घर पर बैठया  तो प्रकृति  ने एक बार फिर चैन की सांस ली और अब वो पहले से ज्यादा साफ  सुथरी हो गयी है कुछ वर्षों के लिए ये दुनिया ओर रहने लायक बना गयी है.

लॉकडाउन

ने एक बार फिर हमें इस विषय  पर सोचने को मजबूर कर दिया है कि पर्यावरण को बचाना हम सब की जिम्मेदारी है  इसका दुष्परिणाम क्लाइमेट चेज, ग्लोबल वार्मिंग हैं . 

हम सब को क्लामेट चैज की चिंता हो या न हो लेकिन "    ग्रेटा थनबर्ग"  जैसे बच्चे ने प्रशासन से इसके लिए जबाबदेही मांगी है.

अमेज़न के जंगल पर लगी आग जिसने उसकी सुंदरता तो खराब की ही साथ साथ ये भी बात दिया कि अगर तुम उस पर ध्यान नही दोगे तो वो दिन दूर नहीं जब पूरा विश्व इस पर्यावरण के श्राप से बचा नहीं पाएगा हमें आज के लिए नहीं बल्कि आने वाले पीढ़ी के लिए भी सोचना होगा  कि हम उसे कैसा वातावरण दे कर जा रहे हैं.

" वर्तमान समय में इस प्रकृति की कीमत अगर हमने नहीं समझी तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे अगली पीढ़ी किसी म्यूजियम में जाकर हमारे पेड़ों को देख रही होगी और हमें कोसा रही होगी कि क्या छोड़ कर गए हमारे पूर्वज  हमारे लिए सिर्फ प्रदूषण, क्लाइमेट चेज, ग्लोबल वार्मिंग, और हर जगह सिर्फ मरूस्थल यकीन मानिए  तब वो आप पर नाज नहीं बल्कि पचतावा  कर रहे होगे कि इस दिन के लिए हमें धरती पर लाए हैं ".

         

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