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भूल चुके हैं क्या हम?.


आज जब प्राथमिकता की बात करते हैं तो हमारे सामने ये प्रश्न उठता है कि हमारी जिंदगी की क्या प्राथमिकता है और वास्तव में  आज हम किन चीजों पर जोर देने लगे हैं.

जरा गौर कीजिए मेरी इस सवाल का कि जब हम फोन पर कोई भी काम कर रहे होते हैं तो हम बाकी सारी चीजों को भूल कर अपना ध्यान केवल फोन पर ही लगाते हैं फिर चाहे कितना  भी लोग हमें चिल्ला ले या कुछ कहे हम उस पर ध्यान नहीं देते किन्तु वहीं उसके विपरीत अगर  हम कुछ पढ़ रहे ऐसा कोई काम कर रहे जिसे करना शायद हमारी मजबूरी है तो हमारा ध्यान उस पर नहीं लगता .

इसका एक कारण जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि आज हमारी प्राथमिकता पहले से बहुत बदल गयी है .

** आज समकालीन समय में जब हमें ये लगता है कि हम दूसरे व्यक्ति से बहुत समझदार है तब हमें इस चीज का जरूरी अनुमान लगाना चाहिए कि आज क्या हम जिन चीजों को प्राथमिकता देते हैं क्या सच में  वो हमारे लिए इतनी जरूरी है **.

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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

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पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..