हम ही न रहे तो किस चीज का होगा विकास






    "  जहाँ विकास हुआ वहां- वहां  पेड़ों को कांटा"
 क्या किसी ने सोचा कि  जिसनें उस पेड़ को लगाया होगा   उसने ये सोचा होगा कि  विकास के नाम पर उसका अस्तित्व ही खत्म  हो जाऐगा । 
आज जहाँ हर कोई केवल अपने बारे में सोच रहा हैं उसे किसी की फ्रिक ही नहीं है  और वो वस्तुओं का उपभोग कर रहा है।
उसने क्या  सोचा कि कल वो किस तरह का जीवन  जिऐगा  जब उसके  पास न तो प्रकृति के साधन होगे न जीवन सुगम जीने का तरीका उसे पानी जैसी चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। जब पानी का कोई  स्त्रोत ही नहीं होगा ।
"हम ज्यादा नहीं तो इतना तो कर ही सकते हैं कि हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करे।
कल के लिए आज बेहतर काम करे और जिंदगी को सादगी के साथ बिताऐं। "
किसी ने बहुत सही कहा है कि बूंद बूंद से घड़ा भरता है।
           

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