कॉर्पोरेट जगत जहां के आकर्षण को देखकर अक्सर लोग उसके पीछे की सच्चाई भूल जाते हैं। जो बाहर से एक दम पेशेवर नजर आता है। लेकिन उसके पीछे होता है वो जिसकी शायद आप कल्पना ही नहीं कर सकते हैं।
जहां कोई किसी का सगा नहीं है । हर चीज के पीछे एक स्वार्थ छिपा है। जो उन्हें कॉर्पोरेट की घटिया राजनीति सहने को मजबूर करता है। क्योंकि आखिर सवाल भी तो दो रोटी और तोड़ी शान शौकत का होता है।
जिसके चलते वो अपनी सैलरी से दुगुना तनाव झेलता है। जहां इस तनाव को कम करने के लिए वो सिगरेट पे सिगरेट का इस्तेमाल करता है। जो उसके तनाव को कम तो नहीं करता लेकिन उसे थोड़ा तनाव सहने की हिम्मत देता है । और जो बची कुची कसर होती है उसे वो अपने से जूनियर पर गुस्सा निकालकर खत्म कर लेता है।
इस सब राजनीति के बीच सबसे बुरा जो फंसता है वो एक कारपोरेट में आया फेशर जो एक मजदूर से भी कम की सैलरी में इस जगत की हर तरह की परेशानी को सहता है। जिसकी सैलरी भले न बढ़े लेकिन वक्त के साथ उसके काम जरूर बढ़ते हैं। जिसका कोई संगा नहीं होता है ।

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