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Heeramandi: हीरामंडी पर कुछ बोलने से पहले



Heeramandi: 'हीरामंडी' तवायफों की कहानी पर बनी एक फिल्म है। जिसका निर्देशन संजय लीला भंसाली ने किया है। जो अभी हाल ही ओटीटी प्लेटफॉर्म में रिलीज हुयी है। 
 जिसको लेकर ऑडियस की अलग अलग प्रतिक्रिया आ रही है।  कुछ लोग इसकी तारीफ करते नहीं थक रहे है। तो कुछ लोग फिल्म की आलोचना कर रहे है।


ऐसे में इस फिल्म पर बात करना जरूरी हो जाता है...

बता दें कि कोठे पर बनी ये पहली मूवी नहीं है इससे पहले श्याम बेनेगल ने 'मंडी' बनाई थी। जो उनके दर्द को काफी हद तक बयां कर रही थी। जो काफी रियलस्टिक थी।

वहीं जब बात हीरामंडी की हो रही है। तब ये समझना जरुरी हो जाता है कि संजय लीला भंसाली अपनी बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, लग्जरी प्रोडाक्शन के लिए जाने जाते है। जो उन्हे बाकी डायरेक्टर से अलग बनाती है।
 
ऐसे में जब आज उनकी मूवी की आलोचना की जा रही है तब हमें ये समझना जरुरी है। कि आज के समय का ऑडिशन बदल रहा है। जिसें हर चीज में आकर्षण चाहिए। ऐसे में किसी हिस्टोरिकल स्टोरी पर कोई मूवी बनाना बेहद मुश्किल है।
 
जिसमें हर तरह से जान डालना और भी ज्यादा चेलेजिंग काम है। ऐसे में जब कोई डॉयरेक्टर अपनी क्रिएटिविटी का उपयोग कर कुछ नया ला रहा है। तो हमें उसकी इनोवेटिव आईडिये का सम्मान करना चाहिए । न कि उसकी ये कहकर आलोचना करनी चाहिए कि ये रियल नहीं है। 


तारीफ के लायक है हीरामंडी मूवी


 इस मूवी की जो खास बात है वो है तवायफों को एक अलग नजरिये से देखना। जहां पर वो अपने फैसले स्वयं लेती है। जहां अब तक उन पर बनी सब फिल्मों में उन्हें केवल लाचार दिखने की कोशिश की गयी है। वहां 'हीरामंडी' में वो केवल जिस्म का सौदा करने वाली नहीं बल्कि अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली है। जो हर चीज अपनी इच्छा से करती  है।
इस बीच फिल्म में मौजूद उस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए, कि ये मूवी एक सच्ची कहानी पर बनी है। जिसमें कुछ किरदार और घटना भले जोड़ दिये गये हो किन्तु ये फिल्म सत्यता पर आधारित है।
 जो भारत पाकिस्तान की एकता का कड़ा संदेश दे रही है। जो हर उस झूठ से परदा उठा रही है। जहां ये कहा जाता है कि देश की आजादी में मुसलमानों का कोई योगदान नहीं है। ये मूवी उसे गलत साबित करने काफी हद तक सफल हुयी है।
 




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