जब किताबें धुल खाने लगे




एक तरफ जहां हमारी अलमारी कपड़ों से भरी पड़ी है ∣ जिसे देखने तक की हमें फुर्सत नहीं है ∣ वहीं दूसरी तरफ किताबों की अलमारी हर घर से गायब कर दी गयी है ∣ जिसे पढ़ने की भूख अब लोगों में खत्म सी हो गयी है। 
जिस कारण अब शब्द का इस्तेमाल कैसे कब कहां करना है ये इंसान भूल ही गया है ∣‌ 
आज मर्यादा भी अपनी अंतिम सांसे ले रही है ∣ 
वहां किताबें न नयी जन्म ले रही है ∣ न कहानी कहीं बुन रही है ∣ 
शायद अब किताबों की तरह हमें नये विचारों की भी जरूरत नहीं है ∣ उन अनुभवों का स्वाद लेने को हम आतुर नहीं है जो हमें इंसान होने का अर्थ बताती है ∣ 

किताबें जो कभी किसी का साथी होती थी। जिन पर घंटों नजरे जमाएं लोग रहते हैं। अफ़सोस अब उन पर नजर कहां झुकती है ∣
जो साथी होती थी किसी के गम का वो अब अकेले धुल खाती है ∣
सबकुछ जहां ऑनलाईन आ गया है वहां किताबों को स्पर्श करना जैसे एक सपना सा हो गया है ∣
 

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