भाईचारे की जड़ें जब कमज़ोरे होने लगती है




आज अगर पूछा जाएं कि भारत दुनिया में किसी लिए जाना जाता है?
 तब हमारा उत्तर 'अनेकता में एकता' होगा
जहां वो चाहे किसी धर्म या जाति का हो कहलाता भारतीय है। जहां सबका सम्मान किया जाता है। जो सब धर्मों का मान रखना जानता है।
पर वास्तव में क्या आज भी ये सब उतना ही सच प्रतीत होता है? जहां अनेकता को खत्म कर केवल एकता को बल दिया जा रहा है। 
जिसे देख जैसे ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि जिस संविधान को हम अपनी आत्मा कहते है उसमें निहित बंधुत्वता के भाव को खत्म करने की कोशिश आज जोरों से है।

जहां आज एक बार फिर हमें बंधुत्व का आशय समझने की जरुरत है जिसका अर्थ व्यक्ति को किसी भी धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीयता, बोली को भूलाकर देश की  एकता ,अखंडता को सबसे ऊपर रखनी है। भाईचारे की भावना को अपने हदय में संजोना है। जिसकी पहली शर्त ही व्यक्ति के सम्मान से शुरु होती है।


जिसकी आज वर्तमान समय में सबसे ज्यादा कमी नजर आ रही है जहां हर कोई पहले खुद को किसी खास धर्म प्रतिनिधि समझ बाकी सब को नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहा है।
जहां वो अपनी व्यक्तिगत पहचान सबसे आगे बाकी सब कुछ बाद में रखा रहा है। जो बंधुत्व की जड़ आज खत्म कर रहा 'फूट डालो राज करो की नीति' को बढ़ा रहा है।

 जिसको देख आज हम सबको संविधान की उस प्रस्तावना को याद रखने की जरुरत है जिसकी शुरुआत ही 'हम भारत के लोग से होती है' जब उसने ही कोई भेद नहीं किया तब हम कौन होते है, किसी को अलग बताने वाले। 
 

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