वैसे तो देश में कोई न क़ोई राजनेता का बयान सुर्खियों में चलता ही रहता है । किन्तु जब बात किसी एक वर्ग पर टीका टिप्पणी की आ जाती है। तो जैसे देश की हवा ही बदल जाती है।
पर जैसे अब आलोचना करना भी पक्ष ,विपक्ष की बात हो गयी है जहां न राजनेता , न महान हस्तियां और न ही पत्रकार
सब दो समूह में विभाजित हो गए है।
अभी हाल ही का मामला ले लिजिए, जब मणिपुर में एक खास समुदाय की महिला को निवस्त्र कर घुमाया गया था । जिस पर कितनी चर्चा की गयी हम सब से छिपा हुआ नहीं है।
पर अब तक जो पितामह बने आज की दौपद्री का चीरहरण देख रहे थे। वो अब नीतीश कुमार के बयान पर तर्क करने लगे हैं। महिला का अपमान हो रहा है उन्हें इसे दर्द हो रहा है। संसद से सड़क तक इसकी चर्चा हो रही है।
बेशक उनकी बातों को नैतिकता के तराजू में नहीं तौला जा सकता है । जो किसी सभ्य समाज के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। उसकी आलोचना की जानी चाहिए।
किन्तु उसका उद्देश्य केवल राजनीति नहीं होना चाहिए।
गलत को गलत, सही को सही कहने का साहस हमारे पास होना चाहिए।
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