तो दृश्य कुछ ऐसा होता है
चुनाव वो वक्त , जब हर किसी को वोट देने काम पूरा करना होता है। कोई इसे अपनी जिम्मेदारी समझता है तो कोई उसे अपने सिर का दर्द समझता है। पर वो वोट देने जरूर ही जाता है। फिर भले ही वो नोटा का ही क्यों न भक्त हो किन्तु वो अपना कर्तव्य निभाना नहीं भूलता है।
हालांकि जब बात गांव में वोट देने की आती है तब उसका दृश्य ही थोड़ा अलग सा होता है।
इन्हीं में से कुछ दृश्य की आज हम बात करने वाले है...
सबकी तरह हम में भी उस दिन वोट देने का थोड़ा उमंग सा था। आखिर शहर से निकलकर हम पहली बार गांव में वोट देने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे थे।
अब तक हमने श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी से ही गांव के चित्र को जाना समझा था किन्तु अब बात जैसे उसके प्रत्यक्ष दर्शन करने की थी। तो हम भी वोट देने चल पड़े ।
जानकारी लेने पर हमें मालूम चला कि एक शासकीय स्कूल में हमें अपना वोट देना है।
स्कूल का रास्ता पूछते पूछते हम आखिरकार उस गांव पहुंच ही गए।
उस शासकीय स्कूल में, जहां की दीवारों में शिक्षा को लेकर बड़े बड़े विचारों को लिखा गया था।
ऐसा लग रहा था मानों किसी महान शख्सियत ने खुद इन सब का चयन किया हो।
हमने सारी दीवारों को तो नहीं, किन्तु कुछ दीवारों के विचारों को उस लंबी लाईन के बीच पढ़ ही डाला था। जिसे पढ़कर ऐसा लगा रहा था मानों सच में आज परिवर्तन की नदी बह आयी है।
उसके बाद हमने बाकी लोगों की तरह अपने वोट डालने इंतजार करना शुरू किया। जो इंतजार कम, तपस्या ज्यादा लग रही थी। जहां कुछ वीआईपी लोगों के चलते हमारी लाईन न के बराबर चल रही थी।
इसके चलते कुछ लोग तो वोट न डालने का मन भी बना रहे थे किन्तु जैसे हमने उस दिन बड़ा दृढ़ विश्वास कर वोट डालकर ही घर जाने का विचार किया था। हमने अपनी बारी आने का इंतजार किया।
इसके चलते कुछ लोग तो वोट न डालने का मन भी बना रहे थे किन्तु जैसे हमने उस दिन बड़ा दृढ़ विश्वास कर वोट डालकर ही घर जाने का विचार किया था। हमने अपनी बारी आने का इंतजार किया।
जिस बीच कुछ दृश्य जैसे चुनाव के बीच बहुत सी सच्चाई बयां कर रहे थे।
हमारे सामने ही एक भाभी वोट लगें बगैर ही चली गयी क्योंकि उनकी लाईन धीरे और उनके खड़े होने का समय काफी तेज चल रहा था। ऐसा नहीं है कि उनके जाने पर उन्हें किसी ने रोका नहीं, किन्तु उन्होंने किसी की न सुनते हुए जाने का अटल फैसला कर रखा था। जाते जाते वो कुछ शब्द कह गयी जो जैसे बड़ा ही शाश्वत प्रतीत हो रहा था '' कि जिन लोगों के लिए हम यहां वोट डालने के लिए चार से पांच घंटे खड़े है कल यहीं लोग जीत जाने पर हमें नजरअंदाज करने वाले है ∣
अभी मैंने उनके कुछ उपदेशों को सुना ही था कि एक दृश्य ने हमारी आंखे सी खोल दी जैसे कि हम जानते है कि दोपहर का वक्त भारतीय महिलाओं के लिए वो घड़ी होता है जब वो दोपहर को अपना सारा काम कर चैन की सांस लेती है ।
इसके चलते कुछ महिलाओं ने भीड़ से बचने के लिए एक जबरदस्त तर्क दिया जिसे सुन हर कोई उनके तर्क को सही ही मानता कि हमारे बच्चे छोटे है हमें उनको भी देखना है, हमारे घर पर बूढ़े लोग है। जैसे तर्क की एक के बाद एक जैसे लाईन ही लग गयी और न चाहते वहां लाईन की व्यवस्था देख रहे पुलिस वालों ने सबको लाईन से चलने को कहा।
तीसरा दृश्य तो जैसे भारतीय राजनीति का अग्रिम सत्य है वैसे घर के अलावा बाहर हर व्यक्ति अपने परिवारों वालों के लिए अपने बराबर ही चिंता करता है जो सामान्य भी है किन्तु जब बात लंबी लाईन की हो तब उसका प्यार दोगुना हो जाता है
"उस दिन भी कुछ यहीं हाल था। महिलाएं जो सादियों रिश्ते बचने का ठेका लेकर रखी है उसकी परंपरा को उस दिन उन्हें बड़ी ही ईमानदारी से निभाना था।''
अपनी जगह में अपने वालों को भी साथ लेने का उन्होने कर्तव्य समझा था फिर भले वो अपनी सारी जिम्मेदारी पूरी कर अब ही आएं हो। पर मंजल कोई उनसे कहे कि तुम इन्हें बीच में कैसे लगा रही हो।
और बदकिस्मती से जिन्होंने ऐसा बोलने की हिम्मत दिखायी उन्होंने जैसे अपने सिर पर मुसीबत का पहाड़ ही तोड़ लिया।
जहां उन्हें ही गलत साबित कर दिया जाता है कि तुम अभी आएं हो ये बाई तो कब से यहां पर आ के खड़ी है।
जो चुनाव से लेकर भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा लक्षण है।
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