कलाम बनाना क्या आसान था
जब राहों में सिर्फ असफलता और सिर्फ असफलता का भाव था
इसके बावजूद जो कर रहा था मेहनत
जिसका सपना आसमां में उड़ान का था।
जब बात कलाम की आती है तब हमारे सामने एक ऐसी शाख्सियत आ खड़ी होती है जिसका संघर्ष झोपड़ी से राष्ट्रपति भवन तक का रहा है। जो जीवन में ढेरों असफलता के बावजूद सफलता को पाने की ओर चला था। इस बीच उसका सामना अनेक परेशानी से हुआ था। उसको पढ़ाई का महत्व समझने वाले उसके अपनों का एक के बाद एक निधन हुआ था। अंदर से टूट गया था वो पर उसने खुद को सम्भाल था।
आसान था क्या ऐसे वक्त में भी काम को करने जाना पर वो कलाम ही था जिसने अपनों को खोने के बावजूद अपने सपनों को पाने के लिए अपना दृढ़ निश्चय मजबूत किया था।

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