केवल वो मनुष्य ही नहीं समझी जाती है

 
कभी दुर्गा, कभी काली 
कभी लक्ष्मी बन जाती है ∣
 पर अफ़सोस वो इंसान ही नहीं समझी जाती है ∣
उस समय मानवता सबसे ज्यादा शर्मसार होती है
जब एक स्त्री की लज्जा 
सेरआम लूट ली जाती है ∣
कभी धर्म के नाम पर
कभी शत्रुता के नाम पर
उसके ही अधिकारों की होली जला दी जाती है ∣
वो स्त्री जो सबको सम्भाले हुए होती है
उसे ही बीच मझधार में छोड़ दिया जाता है ∣


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