शब्दों की अपनी सीमा है

 रिवर्तन संसार का नियम है जो कि होना ही चाहिए। किन्तु जब ये परिवर्तन की दिशा सही न हो तब ये बनी बनायी चीज‌ को बिगाड़ कर रख देता है ∣ इसके चलते ये कहना बड़ा ही लाजमी हो जाता है कि 'प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना हमेशा गलत होता है ∣ 
कबीर के दोहों में शब्द की अपनी महिमा बतायी गयी है ∣ जिस तरह तीर से निकल बाण एक बार छूट जाने पर वापस नहीं लिया जा सकता है ∣ ठीक उसी तरह एक बार शब्द का प्रयोग कर देने पर उसे वापस नहीं लिया जाता है ∣
एक शब्द जहां व्यक्ति के घाव को भरा देता है ∣ वहीं दूसरी तरफ एक शब्द व्यक्ति को घाव कर देता है ∣ इसके चलते शब्दों का प्रयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए ∣
आज के समय में जहां भाषा का स्तर को गिराता जा रहा है ∣ ऐसे समय में हम सब को उसके अस्तित्व को बचाएं रखने की कोशिश लगातार करना है ∣ कि वो ऐसी भाषा न बन जाएं जिसका अपना कोई अस्तित्व  ही शेष न‌ रहे। 


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