मानवता ही बड़ा धर्म है



व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है। जो समाज के बीच रहकर अपना जीवन यापन करता है । 
वो अपने अधिकारों का उपयोग कर जहां एक ओर अपना विकास करता है । वहीं दूसरी ओर उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी होते है जिसका पालन करना अक्सर वो भूल  जाता है । 
 केवल अपने बारे में ही अच्छा सोचने की प्रवृत्ति अक्सर उसे एक ऐसा प्राणी बना देती है। जो केवल अपने हित को आगे रखता है। 
उसका उद्देश्य केवल लाभ को लेना होता है । 
जिम्मेदारी जैसे कोई चीज से उसका कोई वास्ता ही नहीं होता है। नैतिक मूल्यों के पन्नों का हास उस समय सबसे ज्यादा होता है । 
जहां एक तबका प्रगति तो दूसरा तबका बेबसी के आगे झुका रहा होता है। 
ऐसे में ज्यादा नहीं तो इंसान को इतना तो करना ही चाहिए कि वो कुछ जरूरतमंद की मदद करें। 

 

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