जो हारा नहीं वो जीत भला कैसे सकता है। जो कोशिश करने से ही डर गया वो भला कैसे आगे बढ़ सकता है।
वैसें तो अब तक सफलता के बारें में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जो लोगों के दिमाग में इस तरह से बैठ गया है। कि जब भी वो अपने जीवन में सफलता को प्राप्त करने की कोशिश करता है। तब वो उन विचारो को अपने मन में आत्मसात करने लगता है जो उसे सफलता पाने को मजबूर करते हैं।
किन्तु आज हम सफलता पर नहीं बल्कि असफलता पर बात
करने वाले है जिसके बदौलत हम ने अपने जीवन में बहुत कुछ बेहतर पाया है। ये बात शीशे की तरह साफ है कि अक्सर इंसान अपना मूल्याकंन तब ही करता है। जब वो जीवन में असफलता का सामना करता है ∣
वो असफलता के अनुभव को महसूस कर गहन चिंतन मनन करता है।
ऐसे समय में जरूरी होता है कि वहां अपना मूल्याकंन करें। अपने अहम को अलग रखकर आगे बढ़े। जब जाकर वो सफलता को पाने की ओर बढ़ता है। पहली बार में ही उसे सफलता मिल जाएं ये अक्सर बिल्कुल जरूरी नहीं होता है।
जीवन में असफलता से सफलता प्राप्त करने के लिए जरूरी होता है ∣
कि इंसान अपनी असफलता के बावजूद आगे चलते जाने
का साहस रखें ∣ अपने जीवन के उन क्षणों को याद रखें जब वो जीवन में असफल होने के बावजूद सफलता हुआ था ∣ उसने अपनी असफलता से ही सीख कर अपनी सफलता का रास्ता बनाया था ∣
उसे याद रखना होगा ∣ अपना वो अतीत जिसने उसे आज यहां तक पहुंचाया है ∣ जो उसे कभी हार नहीं मानने देता है ∣ यहीं वो एक चीज है जो इंसान को हर असफलता के बावजूद सफलता को पाने का जुनून देती है ∣ देर से ही सही वो सफल होता जरूरी है ∣ उसकी सफलता उसकी असफलता की तरह शानदार होती है ∣

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