भारत को आजादी दिलाने में स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है∣ इसे हम सब बखूबी जानते हैं ∣ बात चाहे गांधी युग के समय हुए असहयोग आंदोलन की हो या भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की इन सब का भारतीय स्वतंत्रता
में अहम योगदान रहा है ∣
वहीं जब हम मध्यप्रदेश के पत्रकार और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका देखते हैं तो पाते हैं भारत में पहला अखबार जेम्स ऑगस्टस हिक्की के द्वारा 29 जनवरी 1780 में निकाला गया था ∣
जबकि इसके विपरीत 'हदय प्रदेश' के नाम से मशहूर मध्यप्रदेश में जेम्स ऑगस्टस हिक्की के द्वारा निकाले गए अखबार' हिकीज गजट' के पूरे 69 साल बाद 6 मार्च 1849 में इन्दौर से 'मालवा अखबार' का प्रकाशन किया गया था ∣ जो आगे चलकर मध्यप्रदेश का पहला अखबार हुआ था ∣
इस अखबार को लेकर खुद वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित कर रहे लार्ड लिटिन ने कहा था कि "सबसे अधिक साहसी राजद्रोह उत्तर भारत के भारतीय भाषाओं पत्रों में लिखा जा रहा है ∣ एक मराठी राजधानी (इंदौर) से प्रकाशित 'मालवा अखबार' बहुत चुभता है ∣ इसमें लिखा है कि देश की सरकार का मुख्य उद्देश्य हर तरह की चालबाजियों से जनता के जेब से उनका रूपया निकालना है ∣
इस तरह मध्यप्रदेश का पहला अखबार अंग्रेजी हुकूमत संघर्ष करते हुए बंद हो गया था लेकिन मालवा अखबार अपने पीछे छोड़ गया ∣ एक संदेश कि जब -जब हम सत्य को शब्द देने की चेष्टा करते हैं ∣ तब ब्रिटिश शासन की हम दमन नीति के शिकार होते हैं ∣
इसी क्रम में भोपाल से सन् 1883 में प्रकाशित होने वाले 'सदाकत' ने अपने अखबार में बड़ी निर्भीकता के साथ रियासत में हो रहे गलत कामों को लेकर अपनी कलम चलाई थी ∣
वहीं विध्य प्रदेश से निकलने वाली मैगज़ीन में 'भारत भ्राता' एक ऐसा समाचार पत्र बन गया था ∣ जो अपने आरंभ से राष्ट्रीयता से जुड़ था ∣ इसे मध्यप्रदेश का पहला राजनैतिक पत्र भी माना जाता है ∣ इसका आरंभ 1887 अप्रैल में हुआ था ∣ इसके संपादक रीवा राज्य के सेनापति लाल बलदेव सिंह थे ∣ इस में साहित्य शिक्षा के अलावा राजनीति पर लेख छापे जाते थे ∣
वहीं 7 अप्रैल 1913 को खण्डवा से हिंदी मासिक पत्रिका 'प्रभा 'का प्रकाशन आरम्भ हुआ था ∣ इसका सम्पादन पड़ित माखनलाल चतुर्वेदी ने किया था ∣ इसमें मुख्य रूप से राजनीति, विज्ञान ,अर्थनीति पर विचारोत्तेजक लेखों का प्रकाशन किया जाता था ∣ इसमें तीखे लेखों से फिरंगी हुकूमत पूरी तरह से डरी हुई रहती थी ∣ आगे चलकर इसका प्रकाशन गणेश शंकर विद्यार्थी ने किया था ∣
इसके अलावा गांधी युग की लहर जब समूचे भारत में फैल रही थी उसी समय पं माधवराव सप्रे, पं विष्णुदत्त शुक्ल और ठाकुर छेदी लाल सिंह ने जबलपुर में 'राष्ट्र सेवा' लिमिटेड की स्थापना की ∣
माखनलाल चतुर्वेदी ने कर्मवीर के लिए घोषणा पत्र देते हुए लिखा था -
कि मैं ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिश शासन चलते - चलते रूक जाएं ∣
17 जनवरी 1920 से 'कर्मवीर ' का प्रकाशन जबलपुर में आरंभ हुआ था ∣
वहीं स्वंतत्रता की भावना से ओत प्रोत मध्यप्रदेश का प्रथम दैनिक अखबार 'प्रकाश' 11 जून 1923 को सागर से प्रारंभ किया गया था ∣ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हर खबर को इसमें प्रमुखता से छापा जाता था ∣ जहां एक तरफ देश के नामी अखबार 'अमृत बाजार पत्रिका' और 'हिन्दू' अखबार अंग्रेजी हुकूमत को खुश करने के लिए पत्रकारिता कर रहे थे ∣ वहीं उस समय प्रकाश देश के लोगों के हितों को लेकर आवाज उठा रहा था ∣
सन् 1925 में नरसिंहपुर से साप्ताहिक 'नृसिंह' का प्रकाशन हुआ इसके संपादक ठाकुर राम शीषसिंह थे यह अपने समय का एक निर्भीक पत्र था ∣ इसमें मुख्य तौर पर राष्ट्रीय आंदोलन से प्रेरित समाचार को प्रमुखता दी जाती थी ∣
राष्ट्रीय आंदोलन को प्रबल समर्थन देते हुए 18 फरवरी 1930 को 'लोकमत' निकाला गया था ∣ जो लोगों की आवाज बन गया था ∣ हालांकि फिरंगी के दमन का ये जल्द ही शिकार हो गया 1932 में इसे बंद करना पड़ा ∣
वहीं भोपाल से सन् 1934 में शाकिर अली खां के संपादन में 'सुबह-ए-वतन' का प्रकाशन आरंभ किया ∣ पूरे पचास साल बाद कोई तेजस्वी और हुकूमत की गडबड़ियों पर उंगली उठाने वाला अखबार बनकर प्रकाश में आया ∣
ये अखबार मुख्य तौर पर कार्टून जरिए अपनी बात रखता था ∣ इसके अलावा ये उर्दू के तीखे शेर से भी अपनी अभिव्यक्ति करता था ∣ इस अखबार ने जनता के हिमायती और हुकूमत के हिमायती अखबार के बीच भेद - भाव पर कटाक्ष करते हुए लिखा था :-
"हम आह भी भरते है तो हो जाते हैं बदनाम ∣
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नही होती ∣"
वहीं जब हम मध्यप्रदेश के उन पत्रकारों की ओर देखते हैं जिनका स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान रहा है तब हम उसमें सबसे पहले प्रोफेसर बरकतउल्ला भोपाली को पाते हैं जिन्होंने ने लंदन से 'खिलाफत' का सम्पादन - प्रकाशन किया था ∣
वहीं रीवा की धरती से जन्मे लाल बलदेव सिंह ने कलकत्ता से शिक्षा ग्रहण कर 1887 में समाचार पत्र 'भारत भ्राता' प्रकाशित किया था ∣ जो आगे चलकर मध्यप्रदेश का प्रथम राजनैतिक पत्र बना था ∣ इन्हीं के प्रयत्नों की बदौलत रीवा में देवनागरी लिपि का उपयोग करने के साथ हिंदी को राजभाषा का दर्जा 1895 में मिल गया था ∣
वहीं अपने प्रखर विचारों के लिए मशहूर पं. माधवराव सप्रे ने 'हिन्दी केसरी' के जरिए लोकमान्य तिलक की क्रांतिकारी पत्रकारिता के हिन्दी जगत में बीज बोए थे ∣ इसके अलावा सप्रे ने कर्मवीर के पर्दे के बीच रह कर राष्ट्रीय आंदोलन का प्रचार प्रसार किया था ∣
एक भारतीय आत्मा के नाम से जाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी लेखनी से अंग्रेजो की नाक में दम कर लोगों को स्वतंत्रता के असली मायने बताएं थे ∣ वहीं दूसरी और माधवराव ने हिन्दी केसरी के द्वारा बाल गंगाधर तिलक के क्रांतिकारी विचारों से लोगों को अवगत कराया था ∣
इसके अलावा अपनी कलाम का लोहा मनवाने वाले रामकृष्ण पाण्डेय एक ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था ∣ इसके चलते उन्हें क ई बार जेल की यात्रा करनी पड़ी थी ∣
वहीं कन्हैयालाल वैद्य मध्यप्रदेश के वो पत्रकार रहे हैं जिनकी पत्रकारिता का मुख्य काम अंग्रजों और सामंतों के षडयंत्र का भण्डाफोड़ करना था∣
वहीं इसी क्रम में जब हम मध्यप्रदेश के अखबारों पत्रों पर नजर डालते हैं जिनका स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान रहा है ∣ तब हमें कुछ अखबार सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार से लड़ाई लड़ते हुए दिखाई देते हैं ∣

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