रोज उसका इंतजार करना, कभी ज्यादा तो कभी कम समय में उसे लेना और अपनी मंजिल पर निकलना, जिसके लिए कभी दौड़ना ,तो कभी उसके छूट जाने का दुख मानना ∣
मैं बात कर रही हो उस यात्रा की जो हम से ज्यादा लोग हर रोज करते हैं ∣ कभी कभी तो हम उससे तंग आकर ये भी सोचने लगते हैं कि कितनी अच्छी उन लोगों की जिंदगी होती है ∣ जो इस तरह के कष्ट से दूर रहकर अपने व्यक्तिगत वाहन से आते जाते हैं ∣ न रोज रोज किराए की झझट न ही रोज रोज की बस के लिए दौड़ भाग करते हैं ∣
पर इसके बावजूद हम इस यात्रा के बीच हम ऐसे स्वाद को चखते है ∣ जो हमें बता ही देता है ∣ कि समय की कीमत क्या होती है ? भरी बस में अगर हमें सीट मिल जाएं तो उसकी खुशी क्या होती है ? कई बार तो हम इस यात्रा में अपने उन लोगों से भी मिल जाते हैं जो एक समय तक हमारे सबसे से करीब थे ∣ पर आज वो जैसे हमारे लिए अजनबी से हो गए है ∣
यहां पर सबकी अपेक्षा एक दूसरे से ज्यादा होती है जैसे अगर हम किसी ऐसी सीट पर बैठे है ∣ जिसके शीशे पूरे खुले है ∣ किन्तु उसके एक तरफ छांव दूसरी तरफ धूप है ∣ ये ज्यादा सम्भावना है ∣ जिस सीट पर हम इस लालच से बैठ जाते हैं कि अगर कोई दूसरा आया त़ो हम उसे धूप वाले सीट पर बैठकर खुद बस में आती ठंडी हवा लेकर बस का लुप्फ उठाएगे ∣ उसका परिणाम कई बार हमारी सोच के उलट भी हो जाता है ∣
इसके बावजूद बस में सफर करते हुए हम असली समानता का उदाहरण देख पाते हैं ∣ जहां बैठने वाले केवल महिला और पुरुष होते हैं ∣ जहां सबको समान हक होता है ∣ उस सीट पर बैठने का, जहां कोई किसी के लिए कोई विशेष नहीं होता है ∣
अक्सर हम उस सीट मिलने की खुशी का अर्थ तब समझते हैं ∣ जब कोई बच्चा खाली सीट मिलने पर अपनी मां के साथ उस सीट पर बैठते हुए ऐसे खुश होता है ∣ जैसे उसे दुनिया की बहुत बड़ी चीज मिल गयी है ∣
समय की असली कीमत जैसे हम तब समझते हैं जहां पर एक मिनट अक्सर हमारे सामने से बस निकल जाती है ∣ और हम हाथ पर हाथ रखे बैठे रह जाते हैं ∣ जिसके लिए न बड़ा न छोटा सब भागते है ∣ और जिंदगी के उस आनंद को ग्रहण करते हैं जिसकी कुछ व्यावहारिक शिक्षा हमें इस बस में यात्रा करने के दौरान मालूम चलती है ∣
Comments