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पुस्तक समीक्षा -एक जिंदगी काफी नहीं



किताब का नाम - एक जिंदगी काफी नहीं

आजादी से सन् 2012 तक के भारत की अन्दरूनी कहानी

  लेखक   कुलदीप नैयर 

यहां किताब भारत के आजादी से लेकर 2012 तक  के बीच हुए घटनाक्रम को  हमारे बीच कहानी के जरिये लाती है ∣ जो कभी हमें किसी घटना पर विचार करने का मजबूर कर देती है तो कभी हमारी उन गलतफहमी को खत्म कर देती है जो आज भी हम पल कर बैठे है  ∣ 


ये किताब शुरू तो होती है शीर्षक बचपन और बंटवारे से जहां पर कुलदीप नैयर बंटवारे के दर्द को झेलते हुए कुलदीप सिंह से कुलदीप नैयर हो जाते हैं  जिसका कारण हमें इस किताब को पढ़ने के बाद मालूम चल जाएगा ∣

जैसे जैसे हम किताब को पढ़ते हैं वैसे वैसे हम आजादी, लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू का उत्तराधिकारी, इन्दिरा गाँधी, इमरजेंसी, इमरजेंसी के गहराते साए, ऑपरेशन  ब्लू स्टार, राजीव गाँधी युग, वी पी सिंह का दौर, बाबरी मस्जिद, संसद मे मेरा अनुभव, भाजपा सरकार, मनमोहन सिंह सरकार जैसे विषय पर आधारित कुछ ऐसी कहानी को सुनते हैं जो आमतौर पर हमें सुनाई कुछ जाती है होती उससे कुछ अलग है ∣
 
इस किताब को क्यों पढ़े? 

इसका उत्तर है कि आज भी हम देश की ऐसी क ई कहानी के पीछे के सच को नहीं जानते, जो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं , इसके अलावा कुलदीप नैयर को बतौर पत्रकार किन कठिनाई का सामना करना पड़ा उसके बारें में हम इसमें जानेगें ∣

आज वर्तमान समय की इस किताब की प्रासंगिकता और ज्यादा बढ़ गयी जब देश   में धर्म की राजनीति ज्यादा मुद्दे की राजनीति कम नजर आ रही है ∣





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