बढ़ती आवश्यकताओं के बीच कम होते संसाधन

 

  


हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान हैं  जिसे पाने का अधिकार सबका है ∣ साथ ही अपने देश के नागरिकों की मूलभूत आवश्यक्ताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी उस देश की सरकार की है ∣ फिर भी  अगर कोई देश अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाहन नहीं कर पाता तो ये  तो ये उस देश के लिए शर्म की बात है  ∣

किन्तु अगर मानव अपनी इन मूलभूत आवश्यक्ताओं में दिन ब दिन बढ़ोत्तरी करता जाएगा तो इसमें  गांधी जी का एक कथन 
पूर्ण रूप से सही होगा कि  प्रकृति मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकतीं है किंतु एक लालची इंसान की कुछ भी नहीं ∣


 आज एक तरफ जनसंख्या वृद्धि के कारण देश में जंगलों की कटाई कर वहां पर आवास बनाएं जा रहे हैं ∣ वहीं दूसरी तरफ मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए  प्रकृति के संसाधनो का इस तरह से दोहन कर रहा है ∣ जिसका परिणाम आज हम जलवायु परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं ∣


अगर हमने समय रहते अपने प्रकृति संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं जब हमें पानी की एक एक बूंद का मोहताज होना होगा  ∣  

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