क्या अब समय आ गया है निःशस्त्रीकरण का

 




   निःशस्त्रीकरण  जिसका मतलब " शास्त्रों की होड़ को कम करना है ∣ "

शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश करना  है  जिससे की विश्व में शांति स्थापित हो सके

नि : शस्त्रीकरण की शुरुआत पर हम बात करें तो हम सबसे पहले पाते हैं कि इसका सबसे सफल प्रयास ' वाशिंगटन समझौता " के द्वारा 1921-22 के बीच में वाशिंगटन सम्मेलन में किया गया था∣ 

12 नवंबर 1921 को हुआ था नि : शस्त्रीकरण का पहला सफल सम्मेलन 

 अमेरिकी राष्ट्रपति वॉरेन जी हार्डिंग के द्वारा नौ सैनिकों के शस्त्रों के नियंत्रण के लिए 12 नवंबर 1921 को नि : शस्त्रीकरण का पहला सफल सम्मेलन हुआ था   

जैसा की हम सब जानते हैं ; कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद केवल पांच महत्वपूर्ण नौ सैनिक शक्तियां थी जिसमें ब्रिटेन, अमेरिका और जापान , फ्रांस तथा इटली थे 

 राष्ट्र संघ के द्वारा नि : शस्त्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए कुछ  प्रयत्न भी किए गए थे जो कि निम्नलिखित हैं-

1. स्थाई परामर्शदाता आयोग 1920 में बनाया गया था  ∣

2. अस्थायी मिश्रित आयोग 1920 1924   

3. प्रारम्भिक आयोग 1925

4. जेनेवा का विश्व नि : शस्त्रीकरण सम्मेलन था ∣

 इसके बावजूद नि : शस्त्रीकरण विफल हुआ था

इसके प्रमुख कारण थे -

1. जर्मनी और फ्रांस का नि :  

शस्त्रीकरण  विरोधी दृष्टि कोण

 जहां एक तरफ जर्मनी सुरक्षा से पहले  नि :शस्त्रीकरण चाहता था जिसे युद्ध से सम्बन्धित सामग्री में कमी लाया जाएं वही फ्रांस इससे पहले सुरक्षा की गारंटी चाहता था ∣

2. वैसे तो सभी महाशक्ति के द्वारा   नि :शस्त्रीकरण को बढ़ावा देश का प्रयास किया गया किन्तु किसी भी देश ने इसे

 स्वयं के देश पर व्यावहारिक रूप में लाने की क़ोशिश नहीं की ∣

3. आर्थिक परेशानी के चलते 

नि : शस्त्रीकरण के चलते आर्थिक परिस्थितियों की सम्भावनाओं ने सबको इसे अपनाने से रोका सा दिया ∣

  4. शस्त्रों के परिसीमन में एक तकनीकी समस्या 

वास्तव में नि : शस्त्रीकरण का प्रयास एक तकनीकी समस्या मानकर किया गया जो एक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक समस्या थी जिसके समाधान के लिए प्रभावशाली संगठन की आवश्यकता थी जो सुरक्षा की गारंटी दे सके 

इन कारणों ने आज तक नि :  शस्त्रीकरण  केवल एक कल्पना के समान ही रहने दिया है ∣ जो धरातल पर लाने से पहले भी कही गुम  सा हो गया है ∣ आज जरूरत है कि एक बार फिर हम इस पर  बिना  व्यावसायिक हितों के सोचे विचार करें 

आज समकालीन समय में जब रूस के द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने की सम्भावना लगातार बढ़ती जा रही है ∣ ऐसे में सभी विश्व की महाशक्ति को एक जुट होकर एक बार फिर अहिंसा के पथ पर चलने का प्रयास करना होगा, क्योंकि युद्ध से सिर्फ नुकसान होता है जिसका प्रभाव दो युद्ध कर रहे देशों के अलावा बाकी देशों में भी प्रत्यक्ष  और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है ∣


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