लड़कियों की शादी की आयु 21 करने का विरोध करना है गलत



अभी हाल ही में कैबिनेट में हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन करते हुए लड़कियों के विवाह की आयु 18 से  21 साल कर दी गयी है ∣ जो  लड़कियों के लिए के लिए अच्छा होगा जिससे बालिका साक्षरता में वृद्धि होगी
अपितु उनका शारीरिक और मानसिक विकास होगा

भारत के इतिहास को अगर हम देखें तो पाएंगे कि भारत में 18 वी शताब्दी में  महिलाओं के प्रति होने वाले शोषण चरम  पर थे जहां पर  उन्हें बहु पत्नी विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों का सामना करना पड़ता था

जिसमें आगे चलकर सती  विवाह का विरोध करते हुए  राजा राममोहन राय ने लोगों को  अपनी  बात  पहुंचने के लिए पत्रिका का सहारा लिया था जिसमें  उन्होंने इस   प्रथा का विरोध करते हुए  क ई लेख छापे और समाज को जागरूक  किया

  जिसका संज्ञान लेते हुए तत्कालीन गर्वनर ने सती प्रथा को बंद कर दी साथ ही कुछ समय बाद विधवा पुनर्विवाह बिल लाया गया

किन्तु इसके बाद भी महिलाओं की जिंदगी में कुछ खास परिवर्तन  नहीं आया था जिसका कारण
  बाल विवाह था जिसके परिणामस्वरूप न तो लड़कियों का  शारीरिक विकास हो पाता था और न ही  मानसिक विकास  उनके स्कूल जाने की  उम्र में उन्हें ससुराल भेज दिया जाता था
और कच्ची उम्र में विवाहित लड़कियो  अपने में होने वाले बदलाव को समझे इसे पहले ही वो माँ बन जाया करती थी अशिक्षा और अंधविश्वास के चलते उस समय बाल मृत्यु दर
भी उच्च स्तर पर होती थी

किन्तु   समय के साथ उनकी शादी की उम्र बदलाव किए गए जो  12 से 14 से 18 हुई जो हाल में कैबिनेट के द्वारा लाएं  गए  विधेयक में 18 से 21 कर दी गयी जो लड़कियों के लिए एक  ऐतिहासिक फैसला है  जिसे लाने  का मुख्य कारण
लड़कियों में होने वाले   
एनीमिया को  रोकना, उनका  शारीरिक और  मानसिक विकास करना  बाल मृत्यु दर को कम करना और बालिका साक्षरता को बढ़ावा देना है ∣

  जो फैसला न सिर्फ महिलाओं को सशक्त करता है बल्कि उनको मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा पूर्ण जीवन जीने का भी अधिकार देता है जिस फैसला का हम सबको स्वागत करना चाहिए ∣

जन जन का यही नारा
लड़का और लड़की
का  विवाह केवल
21 साल में  रचाना
यहीं हैं आधुनिक भारत हमारा  
   

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