कब हम वक्त से आगे निकल गए
जैसे पता ही न चला
दोस्त कब पीछे छूट गए
जैसे मालूम न चला,
समय को खबर न लगी
हम आगे बढ़ते गए
जिंदगी के दुख, सुख का स्वाद
लेते हम एक जगह से दूसरी जगह
चले गए,
जिंदगी के लिए
एक कदम और आगे रखने के इरादे
से
हम कुछ जिंदगी के स्मरण को
भुलाने की जैसे कोशिश करने लगे,
जिंदगी में पीछे छूटते रिश्तों
का धागा कब टूटने सा लगा
हमें जैसे खबर ही न लगी
बिता गए हफ्ते
लग गए महीने
और सब चल दिए
अपने अपने रास्ते ।

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